
Iran Before 1979: पश्चिमी एशिया का शिया बहुल देश ईरान आज इजरायली और अमेरिकी हमलों के कारण चर्चा में है। ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामनेई की मौत के बाद वहां राजनीतिक और धार्मिक माहौल में बदलाव की आशंका बढ़ गई है। 1979 की ईरानी क्रांति से पहले देश पर शाह मोहम्मद रजा पहलवी का शासन था। वे अमेरिका के करीबी सहयोगी थे।
उस समय ईरान एक आधुनिक और पश्चिमी देश था। महिलाओं को कई प्रकार की आजादी थी, वे मिनी स्कर्ट पहन सकती थीं, पुरुषों के साथ घुल-मिल सकती थीं, गाड़ी चला सकती थीं और उच्च पदों पर तैनात हो सकती थीं। हिजाब पहनना अनिवार्य नहीं था।
सफेद क्रांति की शुरुआत
पहलवी ने 1963 में 'सफेद क्रांति' की शुरुआत की, जिसके तहत जमीन सुधार, महिलाओं को वोट का अधिकार और शिक्षा पर जोर दिया गया। साक्षरता दर बढ़ी और 1970 के दशक तक विश्वविद्यालयों में करीब एक-तिहाई छात्राएं थीं। शहरों में नाइट क्लब, सिनेमा हॉल और पश्चिमी शैली के कैफे आम थे। शराब और सिगरेट पर कोई पाबंदी नहीं थी। तेल की आमदनी के दम पर ईरान तेजी से विकसित हो रहा था।
शाह का शासन तानाशाही
हालांकि, शाह का शासन तानाशाही पूर्ण था। उनकी खुफिया एजेंसी 'सावाक' (SAVAK) विरोधियों का दमन करती थी। अमीर और गरीब के बीच खाई बढ़ गई थी। ग्रामीण और धार्मिक लोग पश्चिमीकरण से असंतुष्ट थे। इस असंतोष और धार्मिक पहचान खोने के डर ने 1979 की क्रांति को जन्म दिया। 1978-79 में देशभर में बड़े प्रदर्शन हुए। धार्मिक नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी, जो निर्वासन में थे, आंदोलन का चेहरा बनकर उभरे। जनवरी 1979 में शाह को देश छोड़ना पड़ा। फरवरी 1979 में खुमैनी ईरान लौटे और राजशाही खत्म कर दी गई। जनमत संग्रह के बाद ईरान को 'इस्लामिक रिपब्लिक' घोषित किया गया।
सुप्रीम लीडर का बनाया गया पद
नई व्यवस्था में सर्वोच्च नेता (सुप्रीम लीडर) का पद बनाया गया, जो राष्ट्रपति से भी ऊपर है। खुमैनी पहले सुप्रीम लीडर बने। उनके बाद अली खामेनेई उनके करीबी सहयोगी के रूप में उभरे। खुमैनी की 1989 में मौत के बाद संविधान में बदलाव कर खामनेई को सुप्रीम लीडर चुना गया। क्रांति के बाद शरिया आधारित कानून लागू हुए, महिलाओं के लिए हिजाब अनिवार्य हुआ और पश्चिमी सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर रोक लगी। ईरान ने अमेरिका और इजरायल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया।
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