
Swaasa AI App: अब सिर्फ दो-तीन बार खांसकर स्मार्टफोन पर अपनी सांस की स्थिति जानना संभव हो गया है। हैदराबाद की स्टार्टअप कंपनी सल्सिट टेक्नोलॉजीज (Salcit Technologies) द्वारा विकसित स्वासा (Swaasa) नामक AI-आधारित मोबाइल ऐप खांसी की आवाज का विश्लेषण करके अस्थमा और सीओपीडी जैसी सांस संबंधी बीमारियों का स्क्रीनिंग कर सकता है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) नई दिल्ली ने इस ऐप को 460मरीजों पर किए गए ट्रायल के बाद अस्थमा और सीओपीडी की जांच के लिए हरी झंडी दे दी है।
कैसे काम करता है स्वासा ऐप?
ऐप बेहद सरल तरीके से काम करता है। मरीज या स्वास्थ्य कार्यकर्ता मोबाइल फोन के माइक्रोफोन के सामने 2-3बार खांसता है। साथ में उम्र, लक्षण और अन्य बुनियादी जानकारी भरनी होती है। एआई एल्गोरिदम खांसी की ध्वनि तरंगों (acoustic signatures) का विश्लेषण करता है और 8मिनट के अंदर रिपोर्ट तैयार कर देता है। रिपोर्ट में बताया जाता है कि फेफड़े सामान्य हैं या नहीं, बीमारी obstructive (अस्थमा, सीओपीडी जैसी), restrictive है या मिश्रित और इसकी गंभीरता कितनी है।
AIIMS ट्रायल में क्या निकला?
AIIMS के सेंटर फॉर कम्युनिटी मेडिसिन में डॉ. हर्षल रमेश साल्वे (एडिशनल प्रोफेसर) की टीम ने इस ऐप को गोल्ड स्टैंडर्ड स्पाइरोमेट्री टेस्ट के साथ 460मरीजों पर परखा। नतीजे सकारात्मक रहे। डॉ. साल्वे ने बताया कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर अस्थमा व सीओपीडी की पहचान में यह काफी प्रभावी साबित हुआ। सामान्य बनाम असामान्य मामलों में लगभग 90%सटीकता और विशिष्ट बीमारियों में 82-87%तक सटीकता देखी गई।
डॉ. साल्वे ने कहा 'खांसी की आवाज से ही पता चल जाता है कि मरीज को कौन-सी सांस की बीमारी है और उसका स्तर क्या है। प्राइमरी हेल्थ सेंटर्स में जहां स्पाइरोमेट्री उपलब्ध नहीं है, वहां यह बहुत उपयोगी साबित होगा।' ट्रायल के बाद AIIMS ने इसे स्क्रीनिंग टूल के रूप में मंजूरी दे दी है। यह ऐप AIIMS के आउटरीच सेंटर्स (जैसे बल्लभगढ़) और स्वास्थ्य शिविरों में भी इस्तेमाल हो रहा है।
मरीजों को क्या फायदे?
1. तेज और आसान जांच:8मिनट में रिपोर्ट, बिना अस्पताल के चक्कर लगाए।
2. सस्ती और पहुंच योग्य:ग्रामीण क्षेत्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC), आयुष्मान आरोग्य मंदिरों में स्वास्थ्य कार्यकर्ता आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं।
3. समय पर इलाज:शुरुआती चरण में बीमारी पकड़ में आने से गंभीर जटिलताएं टल सकती हैं। भारत में अस्थमा और सीओपीडी लाखों लोगों को प्रभावित करते हैं, खासकर प्रदूषण वाले शहरों और गांवों में।
4. गैर-आक्रामक:कोई इंजेक्शन, ब्लड टेस्ट या रेडिएशन नहीं।
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