Success Story: आजादी के पर्व 15 अगस्त पर हरियाणा के महेंद्रगढ़ के भगड़ाना गांव में एक ऐसा परिवार जिसने देश की सेवा में अपना सब कुछ न्योछावर किया। यह कहानी है एक शहीद जवान की पत्नी की, जिसने महज 23 साल की उम्र में पति को खो दिया, लेकिन तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी ने उन्हें टूटने नहीं दिया। साल 1999 में जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक के दौरान सेना में सिपाही आनंद कुमार शहीद हो गए। तारीख थी 14 अगस्त 1999, यानी देश के स्वतंत्रता दिवस से ठीक एक दिन पहले।
उस समय उनकी पत्नी शर्मिला देवी महज 23 साल की थीं। बड़ी बेटी जोनी 6 साल की, दूसरी बेटी सुमित 4 साल की और इकलौता बेटा अरुण सिर्फ 13 महीने का था। शहादत से करीब एक महीने पहले ही अरुण का पहला जन्मदिन मनाया गया था। पति की शहादत की खबर ने शर्मिला देवी की दुनिया उजाड़ दी। शर्मिला बताती हैं कि उस समय वह अपने मायके में थीं। ससुराल पक्ष के लोग उनके मायके पहुंचे और उन्हें बिना शहादत की जानकारी दिए अपने साथ ससुराल ले आए। इसके बाद 17 अगस्त को पति के अंतिम संस्कार के समय उन्हें आनंद कुमार की शहादत की जानकारी हुई। यह उनके जीवन का सबसे बड़ा सदमा था। लेकिन सामने तीन मासूम बच्चों के चेहरे थे। उन्होंने अपने आंसू पोंछे और बच्चों के लिए जीने का फैसला किया। पति के जाने के बाद घर-परिवार से लेकर खेती-बाड़ी और पशुपालन तक की पूरी जिम्मेदारी उन्होंने अपने कंधों पर उठा ली। शर्मिला के सामने सिर्फ बच्चों को पालने की जिम्मेदारी नहीं थी, बल्कि उनके मन में एक संकल्प भी था। वह चाहती थीं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े हों और उनके शहीद पिता का नाम रोशन करें। इसी संकल्प के साथ उन्होंने जिंदगी का एक-एक दिन संघर्ष करते हुए बिताया। कभी खेतों में मेहनत की तो कभी पशुओं की देखभाल की। बच्चों की पढ़ाई के लिए जरूरत पड़ी तो अपनी परेशानियों को पीछे रखा। पति के जाने के बाद मां ने ही बच्चों के लिए मां और पिता दोनों की भूमिका निभाई। शर्मिला की छोटी बेटी सुमित कुमारी आज भी मां के संघर्ष को याद कर भावुक हो जाती हैं। वह कहती हैं कि उनके लिए मां ही मां भी हैं और पिता भी। स्कूल की पीटीएम हो या किसी परीक्षा के लिए बाहर जाना, मां हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं। बच्चों की हर जरूरत के समय शर्मिला उनके साथ मौजूद रहीं।
संघर्ष के पीछे था एक बड़ा सपना
इस संघर्ष के पीछे एक और बड़ा सपना था अपने बेटे को उसी राह पर भेजना, जिस राह पर उसके पिता चले थे। इकलौते बेटे अरुण ने भी मां के इस सपने को अपना सपना बना लिया। उसने बीटेक की पढ़ाई पूरी की और सीडीएस परीक्षा पास करने के बाद भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बन गया। जिस बेटे को शर्मिला ने 13 महीने की उम्र में पिता की शहादत के बाद अपनी गोद में संभाला था, आज वही बेटा सेना की वर्दी पहनकर देश की रक्षा के लिए खड़ा है। बेटे के लेफ्टिनेंट बनने के साथ ही शर्मिला देवी की 24 साल की तपस्या पूरी हो गई। जिस मां ने पति की शहादत के बाद अकेले बेटे को पाला, उसी बेटे को आज सेना की वर्दी में देखकर उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा सपना पूरा होते देखा। शर्मिला की दोनों बेटियों ने भी अपनी मां की मेहनत को व्यर्थ नहीं जाने दिया। बड़ी बेटी जोनी ने बीएड और एमएससी की पढ़ाई की है। इसके साथ ही सीटीईटी और रीट की परीक्षाएं पास कर शिक्षक बनने की तैयारी कर रही हैं। वहीं छोटी बेटी सुमित ने नर्सिंग में एमएससी करने के बाद पीएचडी की पढ़ाई शुरू की है। इस परिवार की सबसे खास बात यह है कि देश सेवा की यह परंपरा सिर्फ एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। परिवार की तीन पीढ़ियां सेना से जुड़ी हैं। शर्मिला देवी के ससुर और आनंद कुमार के पिता हजारी लाल भी भारतीय सेना में कार्यरत थे। आनंद कुमार जब महज छह साल के थे, तभी उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। इसके बाद भी आनंद ने सेना में भर्ती होकर देश सेवा का रास्ता चुना और वर्ष 1999 में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे दिया। अब उसी परिवार की तीसरी पीढ़ी भी सेना में है। आनंद कुमार का बेटा अरुण लेफ्टिनेंट बनकर अपने पिता और दादा की सैन्य विरासत को आगे बढ़ा रहा है। यानी एक ही परिवार की तीन पीढ़ियां दादा, पिता और अब बेटा-देश की रक्षा के लिए सेना में अपना योगदान दे चुकी हैं। दादा हजारी लाल ने सेना में सेवा की, बेटे आनंद कुमार ने देश के लिए शहादत दी और अब पोता अरुण सेना में लेफ्टिनेंट बनकर देश की रक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहा है। जिस दिन पति की शहादत की खबर सामने आई थी, उस दिन शर्मिला की दुनिया उजड़ गई थी। लेकिन आज उसी परिवार में गर्व का ऐसा पल है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।
एक शहीद की पत्नी ने पति को खोने के बाद तीन बच्चों को अकेले पाला। खेत संभाले, पशु संभाले, बच्चों की पढ़ाई संभाली और 24 साल तक अपने परिवार को आगे बढ़ाती रहीं। आज उनके बेटे के कंधों पर लेफ्टिनेंट के सितारे हैं। हालांकि, शहीद परिवार की एक मांग आज भी अधूरी है। शर्मिला देवी के अनुसार, सरकार की ओर से शहीद आनंद कुमार के नाम पर स्कूल और सड़क का नाम रखने की घोषणा की गई थी, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी यह घोषणा पूरी नहीं हो सकी है।
परिवार की मांग
परिवार की मांग है कि सरकार शहीद आनंद कुमार के सम्मान में की गई इस घोषणा को जल्द से जल्द पूरा करे, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को याद रख सकें और गांव के बच्चों को भी उनके जीवन और देश के प्रति समर्पण से प्रेरणा मिल सके। परिवार का कहना है कि शहीद का सम्मान केवल उनके परिवार का सम्मान नहीं, बल्कि पूरे देश का सम्मान है। इसलिए सरकार को शहीद आनंद कुमार के नाम पर स्कूल और सड़क का नाम रखने की लंबित घोषणा को जल्द पूरा करना चाहिए।