
Dussehra 2023: पूरे देश में नवरात्रि की धूम है। विजय दशमी के दिन जगह-जगह रावण दहन किया जाता है। कहा जाता है कि रावण के पुतले को जला हर इंसान अपने अंदर के अहंकार, क्रोध का नाश करता है। इसके साथ ही दशमी के दिन ही मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध किया था। इसलिए इसे विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में आज हम आपको एक ऐसे दशहरे के बारे में बताएंगे जहां रावण का पुतला नहीं फूंका जाता है बल्कि ऐसा कहा जाता है इस दशहरे में स्वर्ग से स्वयं भगवान आते हैं शामिल होने।
हिमाचल प्रदेश के कूल्लू का दशहरा पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहां का दशहरा सबसे अलग और अनोखे अंदाज में मनाया जाता है। यहां पर इस त्योहार को 'दशमी' कहा जाता है जब पूरे भारत में विजयदशमी की समाप्ति होती है तो उस दिन से कुल्लू की फिजाओं में इस उत्सव का रंग और भी चढ़ने लगता है। इस बार कूल्लू में दशहरा उत्सव 24 अक्टूबर से शुरू होगा, जो अगले 7 दिनों तक मनाया जाएगा। माना जाता है कि यहां दशहरे में देवताओं का मिलन होता है और उनके रथों को खींचते हुए ढोल-नगाड़ों की धुनों पर नाचते हुए लोग मेले में आते है। जब पूरे देश में दशहरे के दिन रावण दहन के साथ त्योहार पूरा हो जाता है, तब से कूल्लू दशहरा शुरू होता है और सात दिनों तक चलता है।
100 से अधिक देवता होते हैं शामिल
दरअसल हिमाचल प्रदेश के लगभग हर एक गांव का अलग देवता होता है जिन्हें लोग कर्ता-धर्ता मानते हैं। उनका ये मानना है कि बर्फीली ठंड और सीमित संसाधनों के बावजूद वे इन पहाड़ों पर देवताओं की कृपा से शान से रह पाते हैं। इस दशहरे में 100से ज्यादा देवी-देवताओं को सजी हुई पालकियों पर बैठाकर शामिल किया जाता है।इस शानदार त्योहार को मनाने के लिए बाजार, मेले, प्रदर्शन, नृत्य और संगीत जैसे कई और आकर्षण शामिल हैं। और यह नवरात्रि के बाद सात दिनों तक चलने वाला सबसे लोकप्रिय उत्सवों में से एक है।
कैसे शुरू हुई परंपरा
कहा जाता है कि साल 1650 के समय कुल्लू के राजा जगत सिंह को भयंकर बीमारी हो गई थी। ऐसे में एक बाबा पयहारी ने उन्हें बताया कि अयोध्या के त्रेतानाथ मंदिर से भगवान रघुनाथ की मूर्ति लाकर उसके चरणामृत से ही इलाज होगा। कई मुसीबतों का सामना करने के बाद रघुनाथ जी की मूर्ति को कुल्लू में स्थापित किया गया और राजा जगत सिंह ने यहां के सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया, जिन्होंने भगवान रघुनाथजी को सबसे बड़ा देवता मान लिया। देव मिलन का प्रतीक दशहरा उत्सव शुरू हुआ,जोआज तक जारी है।
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