
Haryana: कहते हैं, ‘इंसान पैसों से नहीं दिल से अमीर होता है’..पैसे कम भी हो और अगर इंसान दिल से अमीर है तो उससे धनी इंसान कोई है। आज हम आपको हरियाणा के एक ऐसे शख्स के बारे में बताएंगे जिसके आगे बड़े से बड़े करोड़पति भी फेल है। उस इंसान का पेशा जानकर आपके पैरों तले जमीन निकल जाएगी
हरियाणा के कैथल के फकीरचंद नाम का शख्स रहता है जिसका काम है कबाड़ बेचना।उम्र 53 साल... हर रोज फकीरचंद की कमाई 600 से 700 रुपये हो जाती है। आप सोच रहे होगें की आखिर इसमें क्या खास बात है ? लेकिन फकीरचंद अपनी कमाई का 90 फीसदी दान कर देते हैं और अब तक 35 लाख रुपये दान कर चुके हैं। यही नहीं फकीरचंद ने भले ही खुद शादी न की हो लेकिन कई लड़कियों की शादी करा चुके हैं जो गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं।इन्होंने अब तक गरीब परिवार से आने वालीं 5 लड़कियों की शादी कराई है साथ ही हर एक लड़की को 75 हजार रुपये का सामान भी दिया है। फकीरचंद के 5 भाई-बहन थे। 4 का देहांत हो चुका है और वह घर में अकेले ही रहते हैं. अकेले जीवन बिताने वाले फकीरचंद के घर की बात की जाए तो 200 गज की जमीन पर बने घर में केवल एक कमरा बना हुआ है। मरने के बाद फकीरचंद इस मकान को भी दान में देना चाहते हैं।
अब एक बार फकीरचंद के दान की लिस्ट जान लेते हैं
• कैथल गोपाल धर्मशाला में गायों के लिए शेड बनवाया, जिस पर 3 लाख रुपए खर्च किए.
• नंदीशाला गौशाला में शेड के लिए 4 लाख रुपये का दान.
• कैथल की नई अनाज मंडी के नजदीक बनी गौशाला को 4 लाख रुपए का दान.
• अरुणाय मंदिर पिहोवा में बनी कैथलवालों की धर्मशाला में भी 1 लाख 70 हजार रुपए की लागत से बनवाया शेड.
• निर्माणाधीन नीलकंठ मंदिर में भी फकीरचंद अब तक 12 से 13 लाख रुपए दान दे चुके हैं.
• वृद्ध आश्रम कमेटी चौक में 2 लाख 30 हजार रुपये की लागत से कमरा बनवाया.
• कैथल में मौजूद खाटू श्याम मंदिर में 3 लाख 60 हजार रुपये से शेड बनवाया.
अब आपको हम बताते हैं 600-700 कमा कर कैसे फकीरचंद इतना दान कर लेते हैं दरअसल, फकीरचंद पिछले 25 साल से कबाड़ बीनने का काम कर रहे हैं. पैदल ही दुकानों से गत्ता खरीदते हैं और फिर उसे कबाड़ी को बेच देता है. इससे 600-700 रुपये की हर रोज कमाई हो जाती है. कमाई की रकम को बैंक अकाउंट में जमा करा देते हैं. जब ज्यादा रकम इकठ्ठा हो जाती है तो उसे विभिन्न सामाजिक संस्थाओं को दान दे देते हैं या फिर सामाजिक कार्यों में लगा देते हैं.
वहीं फकीरचंद का कहना है कि भाई-बहनों के गुजर जाने के बाद पारिवारिक जायदाद उन्हें ही मिली। वो चाहते तो जिंदगी भर आराम से बैठकर खा सकता थे...सारी सुख-सुविधाओं का आनंद ले सकता थे, लेकिन उनका विश्वास मेहनत करके कमाने-खाने पर है. वो मानते हैं कि जब तक मेहनत करते रहूंगे, शरीर भी ठीक रहेगा और शायद इस जन्म में किए गए पुण्य का फल उन्हें अगले जन्म में मिले। उनकी इस दरियादिली का प्रदेश में हर कोई कायल है और उन्हें कलयुग का कर्ण कहा जा रहा है।
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