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Ambedkar Jayanti: नीला झंडा कैसे बना अंबेडकरवादियों की पहचान, अंबेडकर जयंती पर जानें इसका इतिहास और महत्व

Ambedkar Jayanti: नीला झंडा कैसे बना अंबेडकरवादियों की पहचान, अंबेडकर जयंती पर जानें इसका इतिहास और महत्व

Dr. B.R. Ambedkar Jayanti 2026: आज डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर पूरे देश में नीले झंडे लहरा रहे हैं। अंबेडकरवादी कार्यकर्ता, दलित संगठन और नवबौद्ध समुदाय के लोग अपने घरों, वाहनों, मूर्तियों और रैलियों में नीला झंडा फहराते हैं। यह सिर्फ एक रंग नहीं, बल्कि समानता, संघर्ष और आत्मसम्मान का प्रतीक बन चुका है। लेकिन सवाल यह है कि अंबेडकरवादी नीला झंडा ही क्यों लगाते हैं? तो चलिए जानते है इस परंपरा की शुरुआत कहां से हुई और इसका क्या मतलब है

झंडा का रंग नीला क्यों

नीले झंडे की परंपरा डॉ. भीमराव अंबेडकर से ही जुड़ी है। साल 1942 में जब उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन (Scheduled Castes Federation) की स्थापना की, तो पार्टी का झंडा नीला रखा गया। झंडे के बीच में सफेद अशोक चक्र भी था। बाद में 1956 में जब उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया बनाई, तब भी यही नीला झंडा अपनाया गया।

जिसके बाद उन्होंने नीला रंग चुनने का कारण बताया। उन्होंने बताया नीला रंग आसमान का प्रतीक है। आसमान हर व्यक्ति के ऊपर एक समान फैला होता है। इसमें न कोई जाति-पाति का भेद है, न अमीर-गरीब का फर्क। हर इंसान इसके नीचे बराबर है। अंबेडकर का मानना था कि दलित, शोषित और वंचित वर्ग को भी इसी समानता का अधिकार मिलना चाहिए। 

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बौद्ध धर्म और नीला रंग का गहरा संबंध 

1956 में नागपुर की दीक्षाभूमि पर अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। बौद्ध ध्वज (पंचध्वज) में भी नीला रंग प्रमुख है, जो करुणा, शांति और विवेक का प्रतीक माना जाता है। नवयान बौद्ध मत (अंबेडकर द्वारा स्थापित बौद्ध धर्म) में नीला झंडा समानता और मानवता का संदेश देता है। इसी वजह से अंबेडकरवादी कार्यकर्ता इसे अपने आंदोलन, जयंती समारोह और विरोध प्रदर्शनों में इस्तेमाल करते हैं।

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