Health Tips: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक, दुनिया में 10 से 19 साल की उम्र के लगभग हर सात में से एक किशोर किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या से प्रभावित होता है। भारत में भी स्कूली छात्रों की मानसिक स्थिति को लेकर चिंता जताई जाती रही है। NCERT के 2022 के मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण सर्वे में 81 प्रतिशत छात्रों ने पढ़ाई, परीक्षा और रिजल्ट को लेकर चिंता महसूस करने की बात कही थी।
NCERT का यह सर्वे कक्षा 6 से 12 तक के 3,79,842 छात्रों के बीच किया गया था। इसमें 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों के सरकारी और निजी स्कूलों के छात्र शामिल थे। सर्वे के मुताबिक, 11 प्रतिशत छात्रों ने चिंता या घबराहट से जुड़ी परेशानी, 14 प्रतिशत ने अत्यधिक भावनात्मक परेशानी और 43 प्रतिशत ने मूड में बदलाव का अनुभव बताया। वहीं, 67 प्रतिशत छात्रों ने खुशी को अपनी सबसे अधिक महसूस होने वाली भावना बताया।
सर्वे में करीब 49 प्रतिशत छात्र अपनी निजी जिंदगी से संतुष्ट नहीं थे, जबकि 45 प्रतिशत ने अपने शरीर की बनावट को लेकर असंतोष जताया। ये आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की मानसिक स्थिति को केवल परीक्षा के नंबरों या कक्षा में उनके प्रदर्शन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। पढ़ाई में अच्छा प्रदर्शन करने वाला बच्चा भी मानसिक दबाव का सामना कर सकता है।
पढ़ाई और भविष्य की चिंता बन रही तनाव की वजह
बच्चों पर पढ़ाई का दबाव केवल किताबों और परीक्षाओं तक सीमित नहीं रहता। अच्छे नंबर लाने, पसंदीदा स्कूल या कॉलेज में दाखिला पाने और भविष्य में बेहतर करियर बनाने की उम्मीदें भी तनाव बढ़ा सकती हैं। NCERT सर्वे में 84 प्रतिशत छात्रों ने माना कि जीवन में अच्छा करने की जिम्मेदारी उनकी अपनी है। सफलता की इच्छा सकारात्मक हो सकती है, लेकिन जब यह लगातार दबाव में बदल जाए, तो बच्चों की भावनात्मक सेहत प्रभावित हो सकती है।
दोस्तों से तुलना और बुलिंग भी बढ़ाती है परेशानी
स्कूल में नंबरों की तुलना, दोस्तों के बीच अपनी जगह बनाने की चिंता, मजाक उड़ाया जाना और बुलिंग जैसी समस्याएं बच्चों के आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती हैं। NCERT सर्वे में उम्र और कक्षा बढ़ने के साथ छात्रों के आत्मविश्वास तथा निजी जीवन और स्कूल से संतुष्टि में गिरावट के संकेत मिले। माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई, परीक्षा और रिजल्ट को लेकर चिंता के साथ ध्यान लगाने में परेशानी और मूड में बदलाव की बात भी सामने आई।
बच्चों की परेशानी समझने के लिए बातचीत जरूरी
NCERT सर्वे के अनुसार, करीब 49 प्रतिशत छात्र अपनी भावनाएं दोस्तों के साथ साझा करते थे, जबकि 24 प्रतिशत माता-पिता से बात करते थे। भरोसेमंद लोगों के साथ बातचीत बच्चों को अपनी परेशानी व्यक्त करने में मदद कर सकती है। हालांकि, केवल बातचीत ही हर स्थिति का समाधान नहीं है। जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना भी जरूरी हो सकता है।
माता-पिता कैसे रखें बच्चों की मेंटल हेल्थ का ख्याल?
बच्चों की मानसिक सेहत बेहतर रखने के लिए घर और स्कूल में ऐसा माहौल जरूरी है, जहां वे बिना डर अपनी भावनाएं साझा कर सकें। माता-पिता को बच्चों की तुलना दूसरों से करने के बजाय उनकी मेहनत, रुचि और क्षमताओं को समझना चाहिए। परीक्षा के नतीजों को सफलता का एकमात्र पैमाना बनाने से बचना चाहिए।
अगर बच्चा लगातार उदास रहता है, पढ़ाई या दोस्तों से दूरी बनाने लगता है, उसकी नींद या व्यवहार में लंबे समय तक बदलाव रहता है, तो इन संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। बच्चों को यह भरोसा देना सबसे जरूरी है कि उनकी अहमियत केवल नंबरों से तय नहीं होती और परेशानी के समय परिवार उनके साथ खड़ा है।
Also read: Cough Syrup New Rules: अब बिना डॉक्टर की पर्ची नहीं मिलेगी ये वाली दवा, सरकार ने बदले नियम