किसे मिलेगा जनता का आशीर्वाद ?

किसे मिलेगा जनता का आशीर्वाद ?

मुख्यमंत्री मनोहर लाल की जन आशीर्वाद यात्रा जनता का आशीर्वाद लेते हुए लगातार आगे बढ़ रही है। लक्ष्य है 75 प्लस और सीएम अपने इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए जनता का दिल जीतने की कोशिश कर रहे हैं।

तो वहीं दूसरी ओर विपक्षी खेमे में खलबली मची है। नई पार्टियों के लिए जहां खुद को साबित करने, और अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती है,तो वहीं सियासत के मैदान में मंझी हुई पार्टियों के सामने प्रतिष्ठा का सवाल है।

बीजेपी इस वक्त पूरे उत्साह में है। पार्टी का कुन्बा लगतार बढ़ रहा है,विरोधी दलों से उनके नेताओं और कर्यकर्ताओं के टूटने, और बीजेपी में शामिल होने का सिलसिला लगातार जारी है। मुख्यमंत्री जीत सुनिश्चित करने के साथ लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जनता से आशीर्वाद ले रहे हैं, तो वहीं प्रदेश की जनता को विकास परियोजनाओं की सौगात देकर ये आश्वस्त कर रहे हैं, कि जिस विकास का वो वादा कर रहे हैं, उस वादे को पूरे करने की उनकी पूरी नीयत और मंशा है। सीएम की जन आशीर्वाद यात्रा ने विपक्षी खेमे को हिलाकर रख दिया है। विपक्षी दलों में किसी को अपनी खोई हुई सत्ता हासिल करनी है, तो किसी के सामने अपने अस्तित्व को बचाए रखने की चुनौती है। विपक्ष अपनी नीति और रणनीति पर  गंभीरता से न सिर्फ विचार कर रहा है। बल्कि चुनावी समीकरणों को अपने पक्ष में मोडने के लिए जुगत भी लगा रहा है। बात अगर हरियाणा कांग्रेस की करें, तो पिछले दिनों जो कुछ पार्टी नेताओं के बीच हुआ, और व्यक्तिगत तौर पर जो संदेश पहुंचाने की कोशिश की गई, उसने कांग्रेस को रणनीतिक तौर पर और भी पीछे धकेल दिया।

खबर है कि कांग्रेस शीर्ष नेतृत्व ने पार्टी को इस सबसे से उबारने के लिए बड़े आमूल- चूल परिवर्तन का फैसला किया है। जिसके तहत प्रदेश संगठन को मजबूत करने और पार्टी नेताओं की कलह को खत्म करने के लिए नए अध्यक्ष का ऐलान करने वाली है। प्रदेश अध्यक्ष के साथ कांग्रेस ने चार कार्यकारी अधयक्ष बनाने का भी फैसला किया है। खबर है कि कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर की कुर्सी छिन सकती है, और तंवर की जगह पार्टी ने कुमारी शैलजा को प्रदेशाध्यक्ष बनाने का फैसला किया है। इसके साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष भी नियुक्त किए गए हैं। वीरेंद्र मराठा, दीपेंद्र हुड्डा, कुलदीप बिश्नोई और कैप्टन अजय यादव को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया है।

वक्त कम है, और काम ज्यादा, ऐसे में विपक्षी दल सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में कैसे मोड़ते हैं, ये देखना दिलचस्प होगा। कयोंकि अगर विपक्ष यहां चूक गया, तो फिर उसके लिए अपनी सियासी जमीन पाना मुश्किल होगा।

 

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