
नई दिल्ली: चैत्र नवरात्री के छठे दिन मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की पूजा होती हैं। मां दुर्गा का यह स्वरूप करुणामयी है। शास्त्रों के अनुसार कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इन्हें कात्यायनी कहा जाता है। इसके अलावा यह भी कहां जाता है कि वे देवी शक्ति की अवतार हैं और कात्यायन ऋषि ने सबसे पहले उनकी उपासना की, इसलिए उनका नाम कात्यायनी पड़ा। एक और कथा के अनुसार मां कात्यायिनी का जन्म महिषासुर का वध करने के लिए हुआ था। क्योंकि महिषासुर को ब्रह्मा जी से वरदान मिला था कि इसे स्त्री के अलावा कोई और नहीं मार सकता। इसीलिए मां कात्यायनी का जन्म हुआ था।
मां कात्यायनी का स्वरूप सोने जैसा सुनहरा और चमकदार है। मां चार भुजाधारी है और उनकी सवारी सिंह है. उनके एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कमल का पुष्प रहता है, वही दाहीने दोनों हाथ वरद और अभय मुद्रा में होते है. मां कात्यायनी बहुत फलदायनी मानी जाती है।जब पूरी दुनिया में महिषासुर नामक राक्षस ने अपना ताण्डव मचाया था। तब देवी कात्यायनी ने उसका वध किया और ब्रह्माण्ड को उसके आत्याचार से मुक्त कराया. देवी और महिषासुर बीच कई वर्षों तक घोर युद्ध हुआ। जब देवी महिषासुर को मारने गई तब उसने भैसें का रूप धारण कर लिया। इसके बाद देवी ने अपने तलवार से उसका गर्दन धड़ से अलग कर दिया। महिषासुर का वध करने के कारण ही देवी को महिषासुर मर्दिनी के नाम से भी जाना जाता है।
मां कात्यायनी की पूजा विधि शुरू करते वक्त भक्त को हाथों में फूल लेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यान करना चाहिए। मां की पूजा के बाद महादेव और विष्णु की पूजा करनी चाहिए। श्री हरि की पूजा देवी लक्ष्मी के साथ ही करनी चाहिए। मां लाल रंग के वस्त्र में बहुत सुशोभित करती है। इसलिए भक्त को लाल रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए। माता को शहद का भोग लगाना चाहिए।
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