
What is the importance of Aarti: सनातन धर्म विभिन्नताओं का सागर है। एक ही धर्म में विभिन्न प्रकार के भगवान और उनकी विभिन्न तरीकों से पूजा की विधि बताई गई है। जैसे बिहार में सूर्य की उपसाना जिस विधि विधान से होती है, इसका मतलब ये नहीं है कि भारत के किसी दूसरे हिस्से में समान रुप से पूजा हो। लेकिन एक चीज लगभग हर जहग समान दिखती है। और वो है पूजा के अंत में आरती। आरती का सनातन धर्म में एक अलग ही महत्व माना जाता है। इसलिए किसी भी उपासना का अंत बिना आरती के नहीं होती है।
आरती शब्द संस्कृत के आर्तिका से बना है। इसका अर्थ अरिष्ट, विपत्ति, आपत्ति, कष्ट और क्लेश है। हिंदू शास्त्रों में आरती का मकसद अपने ईष्ट पर आए सभी प्रकार के विपत्ति का हरण करना बताया गया है। दरअसल, सनातन धर्म में हमेशा भगवान को बाल रुप में देखा जाता है। इसलिए भक्त नहीं चाहता कि उसके भगवान के ऊपर कोई भी विपत्ति आए। यही कारण है कि सनातन परंपरा में रोजना आरती की प्रथा है।
आरती के कारण क्या है?
हिंदू शास्त्रों में आरती के दो कारण बताए गए हैं। पहला कारण तो ये कि आरती घुमाते समय भगवान के अंग-अंग चमक उठे और उस दौरान की मनमोहक छवि भक्त अपने ह्रदय में उता सके। इसके अलावा दूसरा कारण यह है कि भक्त एकटक भगवान को निहारते हैं, जिसके कारण भगवान को नजर लग सकती है। इसीलिए आरती की ज्योति से अराध्य के सभी अरिष्ठ नष्ट हो जाएं।
आरती के भाव क्या है?
शास्त्रों में आरती के दो और भाव बताए गए हैं। चूंकि आरती का अर्थ अरिष्ट, दुख और विपत्ति से है। इसलिए आरती का एक भाव ये है कि भगवान भक्त की दुख विपत्तियों का हरण कर लें। लोग इसी भाव को ज्यादा मानते हैं। श्रीराम चरित मानस में खुद गोस्वामी तुलसी दास जी लिखते हैं कि ‘श्रवन सुजसु सुनि आयउं प्रभु भंजन भव भीर। त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।’ यह प्रसंग उस समय का है जब विभीषण लंका छोड़ कर भगवान श्रीराम के पास आते हैं और आरती करते हुए गुहार लगाते हैं कि भगवान उनके सभी दुखों का हरण करें। इसी प्रकार आरती का दूसरा भाव यह है कि हम अपने आराध्य के नख-शिख के सुंदर दर्शन करते हुए उनकी सारी बलैया लेते हैं।
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