डिजिटल अरेस्ट पर UP की पहली कार्रवाई, महिला डॉक्टर से ठगी करने वाले को मिली तगड़ी सजा

डिजिटल अरेस्ट पर UP की पहली कार्रवाई, महिला डॉक्टर से ठगी करने वाले को मिली तगड़ी सजा

First Action On Digital Arrest In UP: उत्तर प्रदेश में साइबर अपराध के एक नए और खतरनाक रूप 'डिजिटल अरेस्ट' के मामले में पहली बार सजा सुनाई गई है। लखनऊ की एक विशेष अदालत ने फर्जी CBI अधिकारी बनकर केजीएमयू की वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. सौम्या गुप्ता से 85लाख रुपये ठगने वाले साइबर अपराधी देवाशीष राय को 7साल की सजा सुनाई है। यह ऐतिहासिक फैसला 438दिनों बाद स्पेशल सीजेएम (कस्टम) अमित कुमार ने 16जुलाई को सुनाया। 

क्या है पूरा मामला?

बता दें, यह मामला 01मई को शुरू हुआ, जब डॉ. सौम्या गुप्ता को एक फोन कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को कस्टम अधिकारी बताया और दावा किया कि उनके नाम पर बुक किया गया एक कार्गो, जिसमें जाली पासपोर्ट, एटीएम कार्ड और 140ग्राम नशीला पदार्थ (एमडीएमए) पाया गया है। इसके बाद कॉल को एक फर्जी CBI अधिकारी को ट्रांसफर किया गया। जिसने डॉ. गुप्ता को धमकाया कि उनके खिलाफ गंभीर कानूनी कार्रवाई होगी और उन्हें सात साल की जेल हो सकती है।

इस डर की वजह से डॉ. गुप्ता ने अपनी निजी जानकारी जैसे बैंक खाता, पैन नंबर, और संपत्ति विवरण साझा कर दिए। आरोपी देवाशीष राय ने 10दिनों तक डॉ. गुप्ता को वीडियो कॉल के जरिए नियंत्रित रखा और मानसिक दबाव बनाकर चार अलग-अलग बैंक खातों में 85लाख रुपये ट्रांसफर करवाए। ठग ने जाली दस्तावेजों और फर्जी सिम कार्ड का इस्तेमाल कर इस अपराध को अंजाम दिया।

पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारी

इसके बाद लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज होने के चार दिन बाद यानी 05मई को विशेष जांच दल ने तकनीकी निगरानी के जरिए देवाशीष राय को गोमती नगर एक्सटेंशन के मंदाकिनी अपार्टमेंट्स से गिरफ्तार किया। जांच में पता चला कि राय ने फर्जी दस्तावेजों का उपयोग कर बैंक खाते खोले थे और जाली पहचान के आधार पर सिम कार्ड हासिल किए थे। पुलिस ने 02अगस्त को चार्जशीट दाखिल की, और मजबूत डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर मामले को प्राथमिकता दी गई।

कोर्ट ने सुनाया फैसला

लखनऊ की सीजेएम कोर्ट ने देवाशीष राय को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं (धोखाधड़ी, जालसाजी, और सरकारी अधिकारी की नकल) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66D के तहत दोषी ठहराया। अदालत ने उसे सात साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई और 68,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस तरह के संगठित अपराध से सरकारी एजेंसियों के प्रति लोगों में डर पैदा होता है, और ऐसे अपराधों के लिए कठोर सजा जरूरी है।

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