Sengol Row: क्या सचमुच राष्ट्र का प्रतीक है सेंगोल? जानें कब हुआ इसका पहला इस्तेमाल

Sengol Row: क्या सचमुच राष्ट्र का प्रतीक है सेंगोल? जानें कब हुआ इसका पहला इस्तेमाल

Sengol Row: दिल्ली के नए संसद भवन के उद्घाटन के वक्त पीएम मोदी ने कुछ नई परंपराएं शुरू की थी। इन परंपराओं में से एक सेंगोल को नई संसद भवन में स्थापित करना था। अब सेंगोल को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सपा ने सेंगोल को हटाकर संविधान को रखने की मांग की है। तो वहीं बीजेपी के सांसद महेश जेठमलानी ने कहा कि सेंगोल राष्ट्र का प्रतीक है। इसको स्थापित किया गया था जिसे हटाया नहीं जा सकता। अब सवाल उठता है कि क्या सेंगोल सचमुच राष्ट्र का प्रतीक है?

राष्ट्र का प्रतीक है या नहीं ये समझने से पहले सेंगोल समझते हैं आखिर ये है क्या? सेंगोल संस्कृत के शब्द संकु से लिया गया है। जिसका मतलब शंख होता है इसको संप्रभुता का प्रतीक माना जाता था। सेंगोल भारतीय शासकों की शक्ति और हक का प्रतीक माना जाता था। ये सोने या फिर चांदी से बनता था साथ ही कीमती पत्थरों से सजाया जाता था। इसको सत्ता हस्तांतरण का प्रतीक भी माना जाता था। इसे राजदंड भी कहते हैं।

कब हुआ इसका पहला इस्तेमाल

इसका पहला इस्तेमाल मौर्य साम्राज्य में हुआ था। फिर गुप्त साम्राज्य से लेकर चोल साम्राज्य और विजयनगर साम्राज्य तक में इसका इस्तेमाल हुआ था। वहीं कुछ इतिहासकार ये भी दावा करते हैं कि देश की आजादी के समय सेंगोल को सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक के तौर पर लॉर्ड माउंटबेटन ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को सौंपा था।

राष्ट्र के प्रतीक में शामिल नहीं

ऐसे में सेंगोल राजा, सत्ता और अच्छे शासन का प्रतीक है लेकिन राष्ट्र का प्रतीक नहीं है क्योंकि केंद्र सरकार की वेबसाइट https://knowindia.india.gov.in/ पर राष्ट्र के जिन प्रतीक चिह्नों के बारे बताया गया है उसमें सेंगोल शामिल नहीं है। इस पर राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा, राष्ट्रगान यानी जन गण मन राष्ट्रीय गीत वंदेमातरम, राजकीय प्रतीक सारनाथ में स्थित सम्राट अशोक के स्तंभ पर उकेरे गए चार सिंह, राष्ट्रीय पक्षी मोर और राष्ट्रीय पशु बाघ को बताया गया गया है। राष्ट्र का प्रतीक कराने वाले इन्हीं प्रतीतों को राष्ट्र का प्रतीक के रूप में मान्यता मिली है।

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