SBI Scheme:बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) कराना आज भी करोड़ों भारतीयों की पसंद है। इसकी वजह है निवेश पर मिलने वाला तय ब्याज और अपेक्षाकृत स्थिर रिटर्न। लेकिन महंगाई और ब्याज पर लगने वाले टैक्स के कारण एफडी से होने वाली वास्तविक कमाई कम हो सकती है। ऐसे में कुछ निवेशक म्यूचुअल फंड की ओर रुख करते हैं। भारतीय स्टेट बैंक समूह की एसबीआई म्यूचुअल फंड स्कीम्स में डेट और हाइब्रिड फंड जैसे विकल्प उपलब्ध हैं। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि म्यूचुअल फंड में रिटर्न की गारंटी नहीं होती और इनमें निवेश का जोखिम एफडी से अलग होता है। इसलिए केवल ज्यादा कमाई की उम्मीद में निवेश करने के बजाय अपने लक्ष्य, समय और जोखिम उठाने की क्षमता को ध्यान में रखना चाहिए।
अगर आप कुछ महीनों के लिए पैसा निवेश करना चाहते हैं, तो एसबीआई सेविंग्स फंड जैसे मनी मार्केट फंड पर विचार कर सकते हैं। ऐसे फंड आमतौर पर ट्रेजरी बिल, सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट और कमर्शियल पेपर जैसे अल्पकालिक मनी मार्केट साधनों में निवेश करते हैं। इनका उद्देश्य कम अवधि में अपेक्षाकृत स्थिर रिटर्न हासिल करना होता है। वहीं, एसबीआई लो ड्यूरेशन फंड उन निवेशकों के लिए एक विकल्प हो सकता है, जो थोड़ी अधिक अवधि के लिए निवेश करना चाहते हैं। हालांकि, इन फंडों में ब्याज दर, क्रेडिट और बाजार से जुड़े जोखिम रहते हैं। इसलिए इन्हें बैंक एफडी जितना सुरक्षित या निश्चित रिटर्न वाला विकल्प मानना सही नहीं है।
बैंकिंग और PSU फंड में निवेश का विकल्प
दो से तीन साल या उससे अधिक अवधि के लिए निवेश करने वाले लोग एसबीआई बैंकिंग एंड पीएसयू फंड की जानकारी ले सकते हैं। इस श्रेणी के फंड मुख्य रूप से बैंकों, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों और वित्तीय संस्थानों की ऋण प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं। इनमें अच्छी क्रेडिट रेटिंग वाले बॉन्ड शामिल हो सकते हैं, लेकिन ऊंची रेटिंग होने के बावजूद जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं होता। ब्याज दरों में बदलाव या किसी बॉन्ड जारीकर्ता की वित्तीय स्थिति बिगड़ने से फंड के रिटर्न पर असर पड़ सकता है। निवेश से पहले फंड की अवधि, पोर्टफोलियो, खर्च और जोखिम श्रेणी की जांच करना जरूरी है।
आर्बिट्रेज और कंजरवेटिव हाइब्रिड फंड में क्या है अंतर?
एसबीआई आर्बिट्रेज फंड और कंजरवेटिव हाइब्रिड फंड भी निवेश के अलग-अलग विकल्प हैं। आर्बिट्रेज फंड नकद और डेरिवेटिव बाजार के बीच कीमतों के अंतर का लाभ उठाने की रणनीति अपनाते हैं, जबकि कंजरवेटिव हाइब्रिड फंड मुख्य रूप से डेट साधनों के साथ सीमित हिस्से में इक्विटी में निवेश करते हैं। दोनों के जोखिम और रिटर्न का स्वरूप अलग होता है। टैक्स के मामले में भी एफडी और म्यूचुअल फंड के नियम अलग हो सकते हैं। डेट म्यूचुअल फंड पर लागू कर व्यवस्था निवेश की तारीख और मौजूदा कानूनों पर निर्भर करती है; इसलिए इंडेक्सेशन का लाभ मिलने की धारणा बनाकर निवेश न करें। ध्यान रखें कि एफडी में पात्र बैंक जमा पर लागू DICGC नियमों के तहत प्रति जमाकर्ता, प्रति बैंक मूलधन और ब्याज मिलाकर अधिकतम 5 लाख रुपये तक बीमा सुरक्षा मिलती है, जबकि म्यूचुअल फंड में ऐसी गारंटी नहीं होती।
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