
SAWAN 2023: पौराणिक कथाओं के अनुसार, सावन के महीने ही मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था तब शिवजी ने प्रसन्न होकर मां पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था।लेकिन भगवान शिव के ससुर और माता सति के पिता दक्ष प्रजापति भगवान शिव को कभी पसंद नहीं करते थे। इसके पीछ कई तरह की पौराणिक कथाएं हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता सती के पिता राजा दक्ष भगवान शिव को प्रथम में पसंद नहीं करते थे। कथा के अनुसार, इसका कारण एक यज्ञ के दौरान हुआ था।
राजा दक्ष ने माना था अपना अपमान
प्रचलित कथाओं के अनुसार एक बार यज्ञ का आयोजन किया गया था जहां पर सभी देवी-देवता पहुंचे थे। इस यज्ञ में जब राजा प्रजापति पहुंचे तो सभी देवी-देवताओं और अन्य राजाओं ने खड़े होकर राजा दक्ष का स्वागत किया। लेकिन शिवजी ब्रह्रााजी के साथ बैठे रहें। तब इसको देखते हुए राजा दक्ष ने इसे अपना अपमान समझा और शिव के प्रति कई तरह के अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। यही कारण था कि शिवजी और उनके ससुर राजा दक्ष की आपस में नहीं बनती।
यज्ञ में शिवजी को ना बुलाने पर नाराज हो गई थी सती
एक समय राजा दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन किया और वहां सभी देवता और ऋषि-मुनियों को आमंत्रित किया गया। हालांकि, दक्ष ने भगवान शिव और माता सती को यज्ञ में नहीं बुलाया। यह उनकी भूमिका के प्रति अनादर और अस्वीकार है। राजा दक्ष भगवान शिव को सर्वोच्च देवता मानने की जगह उन्हें केवल एक देवता मानते थे और उन्हें यज्ञ में महत्वपूर्ण नहीं समझते थे। इसके अलावा, दक्ष को भगवान शिव की विचारधारा और उनके अविनाशी रूप का भी अभिप्रेत नहीं था।
गुस्से में सती ने अग्नि में दे दी थी अहुति
माता सती ने जब यह जाना कि उनके पिता ने उन्हें यज्ञ में नहीं बुलाया है, तो वह दुःखी हुई और अपने पिता के पास गई। वहां पहुंचकर उन्होंने अपने पिता से यज्ञ के बारे में पूछा और देखा कि वह उन्हें निंदा कर रहे हैं। माता सती ने अपने पिता को यज्ञ में भगवान शिव का सम्मान करने के लिए कहा, उन्हें यज्ञ में शामिल करने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन राजा दक्ष ने उसे अभिप्रेत नहीं किया और उन्हें अनादरपूर्वक उपदेश दिया।
इसके बाद माता सती ने अपने आपको यज्ञ की अग्नि में अहुति देने का फैसला किया और अपने देह को जलाकर प्रेमपूर्वक परमेश्वर में विलीन हो गईं। इससे भगवान शिव ने क्रोधित होकर उनकी भक्ति के प्रतीक रूप में विराजमान रक्तद्रव्य से माता सती के शरीर के अंशों को छिन्न-भिन्न कर दिया और उनकी ताड़ना के रूप में विराजमान हुए।
इस घटना के बाद, भगवान शिव ने अपनी पत्नी माता सती को याद करते हुए विराजमान होने वाले पवित्र स्थानों को तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया। यह कथा माता सती और भगवान शिव के तत्वमय संबंध की प्रतीक है, जिसमें माता सती की प्रेमभावना और उनके पति के प्रति शिव का आदर्श अनुभव किया जाता है।
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