
Iranian Warship: ईरानी युद्धपोत IRIS Dena के भारतीय महासागर में अमेरिकी नौसेना द्वारा डुबो दिए जाने के मामले में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने शनिवार को रायसीना डायलॉग 2026 में कहा कि एक ईरानी जहाज ने भारत में डॉकिंग की अनुमति मांगी और उसे अनुमति भी मिली, जबकि IRIS Dena को श्रीलंका के पास “गलत समय पर” पकड़ा गया।
भारत ने की मदद
विदेश मंत्री ने बताया कि एक जहाज, जो उस समय हमारे समुद्री सीमा के करीब था, उसने डॉकिंग के लिए भारत से संपर्क किया। उन्होंने कहा कि 1 मार्च को हमने कहा कि आप आ सकते हैं और कुछ दिनों में वह कोच्चि में डॉक हो गया। यह मानवता ये थी कि संकट में जहाज को मदद दी जाए।
80 से ज्यादा नाविक मारे गए- विदेश मंत्री
उन्होंने ये भी बताया कि इस घटना से पहले दो अन्य इरानी जहाज भारत में मिलन-2026 (MILAN-2026) अभ्यास में भाग लेने आए थे। अभ्यास के बाद जब ये जहाज लौट रहे थे, तो स्थिति बदल गई। एक जहाज श्रीलंका के पास सुरक्षित रहा, लेकिन IRIS Dena को अमेरिकी टॉरपीडो से मारा गया। ये अंतरराष्ट्रीय जल में हो रहा था और इस हमले में 80 से ज्यादा नाविक मारे गए, जबकि 32 को श्रीलंका नौसेना ने बचाया।
विदेशी सैन्य मौजूदगी का इशारा
जयशंकर ने भारतीय महासागर में पहले से मौजूद विदेशी सैन्य मौजूदगी की भी ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि डिएगो गार्सिया अमेरिकी-यूके सैन्य आधार पिछले पांच दशकों से है। जिबूती में विदेशी सेना की उपस्थिति पहले दशक में शुरू हुई और श्रीलंका के हंबनटोटा पोर्ट का विकास भी इसी दौरान हुआ।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी
ईरानी जहाज पर अमेरिकी हमले को ऑपरेशन एपिक फ्यूरी कहा गया है, जबकि इजरायल ने इसे ऑपरेशन रोअरिंग लायन के तहत समर्थन दिया। इस हमले के जवाब में तेहरान ने ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4 लॉन्च किया है, जिसके तहत इजरायल और खाड़ी देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया और नागरिक बुनियादी ढांचे पर भी हमले हुए हैं।
विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत ने संकट में मानवता के आधार पर मदद की और यह निर्णय भारतीय नीतियों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप था। उन्होंने कहा कि इस घटना ने क्षेत्रीय सुरक्षा और महासागर में मौजूद विदेशी सैन्य ताकतों पर ध्यान दिलाया है, लेकिन भारत ने केवल मानवीय दृष्टिकोण अपनाया।
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