
Premanand Ji Maharaj: वृंदावन के प्रेमानंद महाराज आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं। उन्हें सुनने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। उन्हें अपने जीवन से जुड़ी सारी परेशानियों के बारे में बताते हैं। लोगों की समस्या सुन महाराज जी उन्हें रास्ता भी दिखाते हैं। उनके दरबार में आम जनता से लेकर बड़े-बड़े अभिनेता तक आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि प्रेमानंद महाराज संन्यासी कैसे बनें? उन्होंने संन्यासी बनने का क्यों सोचा?
प्रेमानंद महाराज का जन्म
प्रेमानंद महाराज का जन्म साल 1969में उत्तर प्रदेश के कानपुर के नरवाल तहसील के अखरी गांव के ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका असली नाम अनिरुद्ध पांडे है। उनके पिता का नाम शंभू पांडे है। उनकी मां का नाम रमा देवी है। प्रेमानंद महाराज ने 13साल की उम्र में ही अपना घर त्याग दिया था। जिसके बाद उन्होंने कभी अपने घर का रास्ता नहीं देखा। वह कानपुर जाते रहते है, लेकिन अपने गांव नहीं जाते। घर त्यागने के बाद उनका नया बसेरा वृंदावन बन गया।
बता दें, सबसे पहले प्रेमानंद जी के दादाजी ने संन्यासी बनने का फैसला किया था। प्रेमानंद जी के पिताजी भी भगवान की भक्ति किया करते थे। प्रेमानंद जी महाराज के बड़े भाई भी भगवत का पाठ किया करते थे।
कृष्ण और राधा रानी की भक्ति में लीन
घर त्यागने के बाद प्रेमानंद जी महाराज वृंदावन पहुंच गए। वृंदावन पहुंच उन्होंने शास्त्रों का अध्ययन किया और ठाकुर श्री राधाबल्लभ संप्रदाय से दीक्षा भी ली। इसके अलावा महाराज जी कृष्ण और राधा रानी की भक्ति में लीन हो गए। आज उन्हें सुनने के लिए उनके दरबार में कई लोग आते हैं। उनसे मिलने के लिए लोगों की लंबी कतारें लगती हैं।
प्रेमानंद जी महाराज बताते है कि घर का त्याग करने के बाद उन्हें कई दिनों तक रहे भूखा रहना पड़ता था। वृंदावन पहुंच वह गंगा में तीन बार स्नान करते थे और एक बार ही भोजन करते थे।
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