
Who Is Hansa Mehta: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज रविवार को अपने 'मन की बात’ कार्यक्रम के जरिए नारी शक्ति को नमन किया। उन्होंने कार्यक्रम के 119वें एपिसोड में हंसा मेहता के साहस और बलिदान को याद किया। पीएम मोदी ने बताया कि उन्होंने हमारे राष्ट्र ध्वज के निर्माण से लेकर उसके लिए बलिदान देने में अहम भूमिका निभाई है, जिसे हम कभी भूल नहीं सकते। पीएम मोदी बताते है कि हंसा मेहता का मानना था कि हमारे तिरंगे में केसरिया रंग महिलाओं के योगदान को उजागर करती है।
पीएम मोदी आगे बताते है कि हंसा मेहता को पूरा विश्वास था कि हमारी नारी-शक्ति भारत को सशक्त और समृद्ध बनाने में अपना योगदान जरूर देगी। जो आज सच साबित होती दिख रही है।
नारी शक्ति को किया नमन
आज रविवार को 'मन की बात’ कार्यक्रम के 119वें एपिसोड में पीएम मोदी ने अपने संबोधन में भारत के विकास में महिलाओं के महत्वपूर्ण योगदान को याद किया। इस दौरान उन्होंने आजादी की लड़ाई में शामिल हंसा मेहता जी का भी जिक्र किया। पीएम मोदी बताते है कि हंसा मेहता जी ने हमारे राष्ट्रीय ध्वज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। क्योंकि उनका मानना था कि तिरंगे का केसरिया रंग नारी शक्ति की भावना को दिखाता हैं।
हंसा मेहता जी का मानना था कि आने वाले समय में भारत को सशक्त और समृद्ध बनाने में महिलाओं का अहम योगदान रहेगा। उनकी ये बातें आज सच होती दिखाई दे रही हैं। पीएम मोदी ने कहा कि आज के समय में महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। पुरुषों के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चल रही हैं।
कौन हैं हंसा मेहता?
बता दें, हंसा मेहता स्वतंत्रता सेनानी के साथ एक लेखिका भी थी। उनका जन्म 3जुलाई 1897को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता मनुभाई मेहता बड़ौदा और बीकानेर रियासतों के दीवान थे। हंसा मेहता की शादी जीवराज नारायण मेहता से हुई थी।
हंसा मेहता का राजनीतिक सफर
हंसा मेहता ने साल 1922के बाद राजनीति में कदम रखा। उस दौरान उन्होंने विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों का बहिष्कार किया। उन्होंने आजादी की लड़ाई में भी भाग लिया था। उन्हें बॉम्बे विधान परिषद से प्रतिनिधि भी चुना गया था। आजादी के बाद उन्हें भारतीय संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए विधानसभा की 15महिलाओं में शामिल किया गया। उन्हें सलाहकार समिति और मौलिक अधिकारों पर बनी उप-समिति का सदस्य भी चुना गया था।
हंसा मेहता का साहित्यिक योगदान
राजनीति के साथ-साथ उन्हें साहित्य में भी रूचि थी। उन्होंने गुजराती भाषा में बच्चों के लिए कई किताबें भी लिखीं। इनमें बबलाना पराक्रमो, बलवर्तावली जैसी किताबें शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने वाल्मीकि रामायण और सुंदरकाण्ड का अनुवाद भी किया।
Leave a comment