SC on Mulla Afroz's NSA detention: सुप्रीम कोर्ट ने संभल हिंसा मामले से जुड़े एक आरोपी मुल्ला अफरोज को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने अफरोज की प्रिवेंटिव डिटेंशन यानी निवारक नजरबंदी को रद्द कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि आरोपी ने पुलिस हिरासत के दौरान जो भी कबूलनामे दिया हो, अदालत उसके आधार पर उस आरोपी को प्रिवेंटिव डिटेंशन का आदेश नहीं सुना सकती। इसी के साथ अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर अवैध नजरबंदी आदेश जारी पर 10 लाख का जुर्माना भी लगाया है।
मुल्ला अफरोज की निवारक नजरबंदी पर SC का सवाल
बता दें, इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने की। दरअसल, मुल्ला अफरोज ने अपनी हिरासत को चुनौती देने के लिए पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। अफरोज ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि उसे पुलिस हिरासत और उस दौरान किए गए कबूलनामे के आधार पर निवारक नजरबंदी में रखा गया। लेकिन हाईकोर्ट ने इस प्रक्रिया को सही ठहराते हुए उसकी याचिका को खारिज कर दिया। जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। जिसके बाद जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने सुनवाई की और 08 सितंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया।
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तो वहीं, अब सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए मुल्ला अफरोज की निवारक नजरबंदी को गलत ठहराते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कबूलनामे के आधार पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) 1980 के तहत निवारक नजरबंदी का आदेश मान्य कैसे हो सकता है।
क्या है पूरा मामला?
बता दें, नवंबर 2024 में संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हिंसा भड़क उठी थी। जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। पुलिस छानबीन में मुल्ला अफरोज पर हिंसा में मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया। जिसके बाद उसे हिंसा के लगभग 54 दिन बाद जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाया गया। इसके बाद अफरोज ने अपनी जमानत के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की। लेकिन जमानत मिलने के बाद उनके खिलाफ NSA के तहत नजरबंदी का आदेश जारी कर दिया गया।