
नई दिल्ली: काबुलीवाला फिल्म का वो गाना तो सुना ही होगा, ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन, तुझ पे जां कुर्बान. आज हम सब वतन जाना चाहते हैं, अब वतन हमारी आत्मा में घुस बैठा है. लॉकडाउन में हम सब उम्मीद की एक किरण लिए कैद है. पर वो वतन है कहां, जहां हम जाना चाहते है. जिसकी याद प्रेमिका की तरह सता रही है.
हम जहां रोजी रोटी की तलाश में आए हुए है, हम ऐसी जगहों की कल्पनाओ से ज्यादा तारीफ भी करते थे. कुछ वक्त गुजारने के बाद खुद को वहीं का बताने लग जाते थे. एक महामारी ने सबको हैसियत याद दिला दी. हम चाहे कितने ही बड़े पद पर हो, कितना ही पैसा कमा लिया हो और कितना ही नाम क्यों ना पा लिया हो. एक मजदूर से लेकर और खास तक हर कोई वतन जाना चाहता हैं. क्योंकि दूसरो से विश्वास उठ गया और यकीन खत्म हो गया है. चारों तरफ बेचारगी के अलावा कुछ बाकी नहीं रहा है.
टूटती, बिखरती, संवेदना खोती, दम तोड़ती उम्मीद और घर में कैद जिंदगी ने आखिर हमें अपने गांव की याद दिला ही दी. ये वही हमारा वतन है, जहां की गलियों, पनघट, हरे भरे खेत, मैदानों, स्कूलों, दोस्तों और परिवार के साथ बचपन को गुजारा है. पलायन की वो मर्माहत करने वाली तस्वीर कौन भूल सकता है. जिसने पूरे देश की आंखों को भर दिया था. वो तस्वीर सिर्फ यही कह रही थी कि हम अपनो के बीच जाकर जीना चाहते है और आश्वस्ति महसूस करना चाहते हैं.
याद कीजिए, एरोस्मिथ उपन्यास के प्रोफेसर गॉटलिब को जो आखिरी वक्त पर ये भूल जाते है, कि वह अमेरिका जैसे देश के वैज्ञानिक है और वह जर्मनी के अपने गांव जाना चाहते है. महामारी के इस दौर में गांव के बारे में कुछ भी कल्पना करते ही आंखें भर आती है.
जहां हम रोजी रोटी कमा रहे है भले ही, हमने यहां अच्छे से अच्छे दोस्त पाए हो या सोशल मीडिया पर हजारों दोस्त बनाए हो लेकिन, वे अपनों के खालीपन और रिक्तता को नहीं भर सकते है. ऑफिस में लॉकडाउनके बीच कई दोस्तों के मुंह से मां पापा सुना, सुनकर मन भावुक हो जाता है.
पारिवारिक जिम्मेदारी, भविष्य की चुनौती, कैरियर, खुद को सुरक्षित रखना कई तरह की जंजीरें कदमों को गांव जाने से पहले ही जकड़ लेती है. मेरी नकचढ़ी महबूबा पत्रकारिता भी जब पास होती है बहुत सताती है. जब दूर जाने की सोचता हूं, तो बहुत तड़पाने लगती है.
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