मिड डे मील, साल 2002 शुरू की गई ये योजना अपने जन्म से ही सवालों में है। इसके तहत जहां बच्चों को स्कूल में दोपहर का भोजन दिया जाता है। ताकि बच्चों को दोपहर का भोजन स्कूल में ही मिल सके और उन्हे घर से खाना ना लाना पड़े। लेकिन शुरूआत से ही ये योजना सवालों में रही है। कभी भोजन की गुणवत्ता को लेकर तो कभी इसमें होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर। यही वजह है कि देशभर में इसको लेकर सवाल उठते रहते हैं। ताजा मामला पंजाब के मलोट के प्राइमरी स्कूल का है। यहां बच्चों को पिछले कई दिन से दोपहर का भोजन नहीं मिल रहा है। लेकिन उसके पीछे की वजह हैरान करने वाली है। स्कूल में मिड डे मील का फंड नहीं आ रहा है जिसकी वजह से मील बंद कर दिया गया है।
आलम ये है कि बच्चों को खाली पेट पढ़ाई करनी पड़ती है,नहीं तो उन्हे घर से खाना लाना पड़ता है। कुछ बच्चे घर से खाना लेकर भी आते हैं लेकिन कुछ के पेट पर गरीबी भारी पड़ जाती है। कुछ के पिता मजदूरी करते हैं जिसकी वजह से इन बच्चों के लिए 2 जून की रोटी बहुत मुश्किल हो जाती है।
इस बारे में जब मलोट के दूसरे स्कूलों का दौरा किया गया तो पता चला कि हालात बहुत ज्यादा खराब है। मलोट के पचास प्रतिशत स्कूलों में मिड डे मील नहीं मिल रहा है। मिड डे मील इंचार्ज ने बताया कि फंड नहीं है जिसकी वजह से मिड डे मील बंद कर दिया गया है।
मिड डे मील बच्चों का हक है। कभी इसकी गुणवत्ता इसपर सवाल उठाती है तो कभी भ्रष्टाचार मिड डे मील पर सवाल उठा देता है। कभी वर्कर तो कभी सरकारी सिस्टम कुल मिलाकर मिड डे मील को जिस तरह से पकना चाहिए वैसा नहीं है। सवाल यही है कि आखिर क्यों सरकारी सिस्टम बच्चों के भूख पर भारी पड़ जाता है। क्या छोटे छोटे बच्चों को वक्त पर खाना खाने का हक नहीं है।
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