
नई दिल्ली: जीवन का नाम है, चलते रहना। हर नॉर्मल इंसान पर ये फीट बठता है। लेकिन जब आप अपने आपसे कुछ चाहने लगे तो आप अपनी लिमिट से ज्यादा करने की कोशिश करते है। खेल भी हमसे यही कराता है।
"दस साल में ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने अपने बल्ले को एक महीने तक हाथ नहीं लगाया. इससे पहले मैंने ज़िंदगी में ऐसा कभी नहीं किया। मुझे इस बात का एहसास हुआ कि हाल के दिनों में एक फ़र्ज़ी किस्म की इन्टेनसिटी का दिखावा कर रहा था। मैं ख़ुद को ये बताने की कोशिश कर रहा था कि मुझमें वो इन्टेसिटी है। जबकि आपका शरीर आपसे कह रहा है कि रुको। आपका दिमाग़ आपको कह रहा है कि थोड़ा थम जाओ, ब्रेक लो।"
"मुझे लोग ऐसे शख़्स के तौर पर देखते रहे हैं जो मानसिक तौर पर बहुत मज़बूत है. मैं हूँ भी। लेकिन हर किसी की एक लिमिट होती है। आपको उस लिमिट को पहचानना आना चाहिए वरना चीज़ें आपके लिए अनहेल्थी हो सकती हैं। मुझे ये मानने में कोई शर्म नहीं है, कि मैं उस वक़्त मेंटली डाउन महसूस कर रहा था। मज़बूत होने का दिखावा करना कमज़ोर होने को स्वीकार करने से कहीं ख़राब बात है।"
ये बात भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक विराट कोहली ने अपने फैन्स से कहा।
इसे सुनकर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल था। हम एक प्लेयर की छवी उसके फेंस के साथ बोल-चाल, उसके बयान तथा दूसरे प्लेयर से सुनते है, उसके खेल को देखकर करते है और विराट कोहली जैसे प्लेयर से ये बयान सुनकर तो सच में हैरान करने वाला है। हमें लगता था वो मानसिक तौर पर बहुत फीट है, क्योकि जब वो खेलते है तो दुनिया उसका बखान करती नहीं थकती। लेकिन ये बात सबके सामने उन्होने बिल्कुछ स्पष्ट रखी जैसे उनके साथ हुआ, आज उनके फैंस को उन पर गर्व महसूस हो रहा होगा।
आपको बता दे, हमारे देश में ऐसे ही कितने प्लेयर होगे जो मेंटल हेल्थ से गुजर रहे होगे। जो प्लेयर नहीं है वो भी और जो है वो भी हमको खुद से अपना ख्याल रखना होगा और स्वस्थ रहना होगा।
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