
Indore Water Tragedy: देश के सबसे साफ शहर कहे जाने वाले इंदौर में पीने के पानी की गंदगी ने अब तक 11 लोगों की जान ले ली है, जबकि 1,400 से ज्यादा लोग बीमार हो चुके हैं। भागीरथपुरा इलाके में हुई ये घटना अब सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण हादसा नहीं, बल्कि साफ तौर पर प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की नाकामी का मामला बन गया है। जांच और आधिकारिक बयानों से सामने आया है कि ये त्रासदी रोकी जा सकती थी।
जांच में आया सामने
जांच में पता चला है कि भागीरथपुरा पुलिस चौकी के पास बने एक सार्वजनिक शौचालय के नजदीक मुख्य पेयजल पाइपलाइन में लीकेज था। इसी लीकेज के जरिए सीवर का गंदा पानी पीने की लाइन में मिल गया। सीएम डॉ. मोहन यादव ने खुद इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि लीकेज से पानी दूषित होने के सबूत मिले हैं और ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
पाइपलाइन में लीकेज
शहरी प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय ने भी माना कि पुलिस चौकी के पास पाइपलाइन में लीकेज के कारण सीवर का पानी सप्लाई लाइन में मिला। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट ने भी इस बात पर मुहर लगा दी है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव हसानी ने बताया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज में जांच किए गए सैंपलों से साफ हो गया है कि दूषित पानी पीने से लोग बीमार पड़े और मौतें हुईं।
वरिष्ठ जल विभाग अधिकारी ने दी जानकारी
सूत्रों के मुताबिक, भागीरथपुरा की पुरानी पाइपलाइन बदलने का टेंडर अगस्त 2025 में ही 2.4 करोड़ रुपये की लागत से निकाला गया था। तब भी लोग बदबूदार और गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन न तो काम शुरू हुआ और न ही कोई आपात मरम्मत की गई। मौत होने के बाद ही टेंडर जल्दबाजी में खोला गया। एक वरिष्ठ जल विभाग अधिकारी ने कहा कि ये नाकामी नहीं, लोगों को छोड़ देने जैसा है।
प्रशासन की लापरवाही ने ली लोगों की जान
AMRUT 2.0 मिशन के तहत इंदौर को 2023-24 में करीब 1,700 करोड़ रुपये की जल परियोजनाएं मिलीं। इनमें से कुछ काम हुए, लेकिन कई बड़े पैकेज अब भी टेंडर प्रक्रिया में ही अटके हैं। जल संसाधन विभाग के सूत्र मानते हैं कि देरी और लापरवाही के कारण पुराने इलाकों में सीवर और पीने के पानी की लाइनें आपस में मिल रही हैं।
लोगों ने की गई बार शिकायत
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मामले का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य के मुख्य सचिव से दो हफ्ते में रिपोर्ट मांगी है। तीन सदस्यीय जांच समिति बनाई गई है और कुछ निचले स्तर के अधिकारियों को निलंबित किया गया है, लेकिन यह सवाल अब भी कायम है कि समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई।
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