दिल्ली के चिड़ियाघर पर बर्ड फ्लू का साया, पर्यटकों की एंट्री पर लगी रोक, सैनिटाइजेशन शुरू

दिल्ली के चिड़ियाघर पर बर्ड फ्लू का साया, पर्यटकों की एंट्री पर लगी रोक, सैनिटाइजेशन शुरू

Delhi Bird Flu: देश की राजधानी दिल्ली के चिड़ियाघर में बर्ड फ्लू (H5N1 एवियन इन्फ्लूएंजा) के खतरे ने एक बार फिर दस्तक दी है। जानकारी के अनुसार, दो पेंटेड स्टॉर्क पक्षियों में इस वायरस की पुष्टि के बाद प्रशासन ने नेशनल जूलॉजिकल पार्क पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है। प्रशासन ने इसे 30 अगस्त 2025 से पर्यटकों के लिए अस्थायी रूप से बंद करने का फैसला लिया है। बता दें, यह कदम वायरस के प्रसार को रोकने और जानवरों, पक्षियों, कर्मचारियों, और आगंतुकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

बर्ड फ्लू की पुष्टि और त्वरित कार्रवाई

चिड़ियाघर प्रशासन के अनुसार, हाल ही में दो पेंटेड स्टॉर्क्स की मौत हुई। जिसके बाद उनके सैंपल की जांच में H5N1 वायरस की पुष्टि की गई। इसके तुरंत बाद केंद्र सरकार की 'एवियन इन्फ्लूएंजा की तैयारी, नियंत्रण और रोकथाम के लिए कार्य योजना (संशोधित-2021)' के दिशा-निर्देशों के तहत कड़े कदम उठाए गए। नेशनल जूलॉजिकल पार्क के डायरेक्टर संजीत कुमार ने बताया कि जैव-सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू किए गए हैं और अगले 21 दिनों तक सभी पक्षियों के सैंपल की रैंडम जांच की जाएगी। यदि इस दौरान कोई और मौत नहीं होती, तो हर 15 दिन में कम से कम तीन बार टेस्ट किए जाएंगे ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चिड़ियाघर वायरस से पूरी तरह मुक्त है।

संजीत कुमार ने कहा 'राष्ट्रीय प्राणी उद्यान, नई दिल्ली के जल पक्षी विहार में 2 सारसों की मौत के बाद सैंपल भोपाल भेजे गए थे। राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग संस्थान भोपाल ने 28 अगस्त की शाम को बताया कि दोनों सैंपल HSN1 एवियन इन्फ्लूएंजा वायरस के लिए पॉजिटिव पाए गए हैं। जू के अन्य जानवरों, पक्षियों और सुरक्षा कर्मचारियों में इसके प्रसार को रोकने के लिए तत्काल कार्रवाई शुरू की गई है। जू के जानवरों, पक्षियों और कर्मचारियों के बीच रोग के प्रसार और संचार को रोकने के लिए गहन निगरानी और सख्त जैव सुरक्षा उपाय किए गए हैं।'

बर्ड फ्लू क्या है?

बता दें, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, H5N1 एवियन इन्फ्लूएंजा एक ऐसा वायरस है जो मुख्य रूप से पक्षियों को प्रभावित करता है। लेकिन दुर्लभ मामलों में यह स्तनधारियों और मनुष्यों को भी संक्रमित कर सकता है। यह वायरस पहली बार 1996 में सामने आया था और तब से समय-समय पर पक्षियों में इसके प्रकोप देखे गए हैं।  

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