अब नितिन भाई साहब नहीं 'अध्यक्ष जी' बोलिए, आलाकमान का नेताओं और कार्यकर्ताओं को सख्त संदेश

nitin nabin news: भारतीय जनता पार्टी BJP के संगठन में इन दिनों एक वाक्य बार-बार सुनाई दे रहा है - "पद नाम से बड़ा होता है"। वजह हैं नवनियुक्त कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन। उनके नाम को लेकर हुई एक छोटी सी 'लापरवाही' ने ऐसा संदेश दे दिया कि अब पार्टी में बोलने की भाषा तक पर अनुशासन तय हो गया है। दरअसल नितिन नबीन उम्र और राजनीतिक अनुभव में पार्टी के कई दिग्गज नेताओं से छोटे हैं। इसी वजह से कुछ वरिष्ठ नेता अनौपचारिक बातचीत में उन्हें सीधे नाम से संबोधित कर रहे थे। बात जब ऊपर तक पहुंची, तो हाईकमान का मूड बिगड़ गया। संदेश साफ था - अब वे सिर्फ नितिन नबीन नहीं, "माननीय अध्यक्ष" हैं।
बीजेपी हाईकमान ने दिया सख्त निर्देश
जानकारी के मुताबिक नितिन नबीन के कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद संगठन में प्रोटोकॉल को लेकर सख्ती इसलिए बढ़ी, क्योंकि कुछ वरिष्ठ नेता निजी रिश्तों के चलते पद की गरिमा भूल बैठे थे। हाईकमान को यह संदेश गलत लगा। नेतृत्व का मानना है कि अगर शीर्ष स्तर पर अनुशासन ढीला होगा, तो नीचे तक गलत संकेत जाएगा। यही वजह है कि अब पार्टी ने सभी नेताओं और पदाधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि बातचीत चाहे बंद कमरे में हो या सार्वजनिक मंच पर, संबोधन हमेशा पद के अनुरूप होगा। नाम लेकर बुलाने की आदत पर अब ब्रेक लगा दिया गया है। भाजपा नेतृत्व का मानना है कि संगठन केवल फैसलों से नहीं, भाषा से भी चलता है। पद की गरिमा शब्दों में दिखनी चाहिए। इसलिए पुराने निजी रिश्ते, साथ की राजनीति और दोस्ती, सब एक तरफ रखकर अब पद को प्राथमिकता देने का आदेश दिया गया है। खास बात यह भी है कि नितिन नबीन के जल्द ही पूर्णकालिक राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की संभावना मानी जा रही है। ऐसे में पार्टी किसी भी तरह का भ्रम या असहजता पहले ही खत्म करना चाहती है।
सादगी से मिलते हैं 'नितिन नबीन'
दिलचस्प यह है कि जिस प्रोटोकॉल को लेकर पार्टी सख्त हुई, उसी नितिन नबीन का व्यवहार अब भी वैसा ही सरल है। वे अपने वरिष्ठ नेताओं से उसी पुराने सम्मान और सहजता के साथ मिलते हैं। फर्क बस इतना है कि अब दूसरे पक्ष को सावधान कर दिया गया है कि सादगी को हल्के में न लें। पदभार ग्रहण करते ही नितिन नबीन ने एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत पर चलते हुए पथ निर्माण मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया, लेकिन विधायक बने रहे। पार्टी के भीतर इसे अनुशासन का मजबूत संकेत माना जा रहा है।
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