Bihar: SC के फैसले से बैकफुट पर विपक्ष, कोर्ट ने SIR में दावे-आपत्ति की समयसीमा बढ़ाने से किया इनकार

Bihar: SC के फैसले से बैकफुट पर  विपक्ष, कोर्ट ने SIR में दावे-आपत्ति की समयसीमा बढ़ाने से किया इनकार

Supreme Court On SIR Controversy: बिहार में विशेष गहन मतदाता सूची पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) की उस याचिका पर सुनवाई की, जिसमें मतदाता सूची में दावे और आपत्तियां दर्ज करने की समयसीमा को बढ़ाने की मांग की गई थी। हालांकि, कोर्ट ने 01 सितंबर की समयसीमा को बढ़ाने से इनकार कर दिया, जिससे विपक्ष को बड़ा झटका लगा है।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई

दरअसल, 01 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने RJD और AIMIM की याचिका पर सुनवाई की। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि 01 सितंबर की समयसीमा अपर्याप्त है, क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाता अपने नाम वापस जुड़वाने के लिए आवेदन कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि 22 से 27 अगस्त के बीच ही करीब 95,000 नए दावे दाखिल किए गए। लेकिन इसके बावजूद, कोर्ट ने समयसीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया, लेकिन यह स्पष्ट किया कि वह इस मामले पर नजर रखेगा और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करेगा।

इससे पहले, 22 अगस्त को कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि वह हटाए गए 65 लाख मतदाताओं की सूची सार्वजनिक करे और ऑनलाइन दावे दाखिल करने की सुविधा प्रदान करे। कोर्ट ने यह भी कहा था कि आधार कार्ड को मतदाता पहचान के लिए स्वीकार किया जाए, जिससे प्रक्रिया को और समावेशी बनाया जा सके। हालांकि, समयसीमा बढ़ाने की मांग को ठुकराए जाने से विपक्षी दलों की उम्मीदों को करारा झटका लगा है।

विपक्ष ने की आलोचना

विपक्षी दल, विशेष रूप से RJD, कांग्रेस और AIMIM, इस प्रक्रिया को गैर-पारदर्शी और मतदाताओं के अधिकारों के खिलाफ बता रहे हैं। RJD नेता तेजस्वी यादव ने तो यहां तक संकेत दिया था कि अगर प्रक्रिया में सुधार नहीं हुआ तो विपक्ष चुनाव बहिष्कार जैसे कदम पर विचार कर सकता है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों का स्वागत करते हुए इसे 'संविधान की रक्षा' की दिशा में एक कदम बताया, लेकिन समयसीमा न बढ़ने से उनकी रणनीति को झटका लगा है।

चुनाव आयोग का पक्ष

दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में SIR प्रक्रिया को पूरी तरह वैध, पारदर्शी, और लोकतांत्रिक बताया है। आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाने, गलतियों को सुधारने और जनसांख्यिकीय बदलावों के अनुसार मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए जरूरी है। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि हटाए गए मतदाताओं को नोटिस दी जाएगी और उनके पास दो स्तरों पर अपील करने का अधिकार है। इसके अलावा आयोग ने प्रक्रिया की जानकारी देने के लिए प्रेस रिलीज, विज्ञापन, और SMS जैसे माध्यमों का उपयोग किया है।

 क्या है SIR विवाद?

चुनाव आयोग ने बिहार में मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाने के लिए 25 जून 2025 को विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया शुरू की थी, जो 2003 के बाद पहली बार इतने बड़े पैमाने पर की जा रही है। इस प्रक्रिया के तहत लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट सूची से हटाए गए, जिसमें 22 लाख मृत, 36 लाख स्थानांतरित और 7 लाख डुप्लिकेट नाम शामिल हैं। इस कदम ने विपक्षी दलों में हड़कंप मचा दिया, जिन्होंने इसे 'वोट चोरी' और मतदाताओं के अधिकारों का हनन करार दिया। विपक्ष का आरोप है कि यह प्रक्रिया सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पक्ष में है और इसका उद्देश्य विपक्षी वोटबैंक को कमजोर करना है।

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