क्या होता है तुलादान, जिसका श्राद्ध के दिनों में है विशेष महत्व

क्या होता है तुलादान, जिसका श्राद्ध के दिनों में है विशेष महत्व

 Tula Daan Importance : सनातन धर्म में दान का बहुत महत्व है। दान करने से जीवन के कष्ट दूर होने के साथ साथ ग्रह दोष भी शांत होते हैं। और दान में तुलादान महा दान माना गया है। वहीं पितृ पक्ष के दौरान भी तुलादान का विशेष महत्व है। श्राद्ध के दिनों में गौशाला में तुलादान के रूप में गौआहार दान करने से पितरों के तर्पण का लाभ मिलता है। लेकिन आखिर तुलादान का नियम शुरू कैसे हुआ, इसे किसने शुरू किया और तुलादान से लाभ क्या होते हैं इसी के बारे में आज हम आपसे विस्तार से चर्चा करेंगे।

 धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलादान से जीवन में पुण्य की प्राप्ति होती है। इसमें मनुष्य के भार के बराबर अनाज का दान किया जाता है। इस दान का महत्व और बढ़ जाता है जब इसे किसी विशेष पर्व पर किया गया हो। जैसे पितृ पक्ष को आधात्मिक पर्व माना जाता है। पितृ पक्ष में पितरों के तर्पण के लिए गौ आहार दान का विशेष महत्व है। तुलादान करने वाले कोई भी व्यक्ति गौशाला परिसर पहुंचकर अपने वजन के बराबर किसी भी गौ आहार से तुलादान कर सकते हैं।

नवग्रह से जुड़ी सामग्री का करते हैं दान

तुलादान करने वाले व्यक्ति को तराजू पर अपने वजन के बराबर गौ आहार सामग्री रखनी होगी जिसमें चोकर, गुड़, दर्रा, खल्ली, गौग्रास, कुट्टी शामिल है। इसके अलावा तुलादान में नवग्रह से जुड़ी सामग्री दान करने पर नवग्रहों से जुड़े दोष भी दूर हो जाते हैं। इसमें व्यक्ति को अपने भार के बराबर अनाज का दान करना होता है। ऐसा कहा जाता है कि तुला दान किसी योग्य या जरूरमंद व्यक्ति को ही करना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया है कि अघाये हुए को कभी दान नहीं करना चाहिए, इससे उसका पुण्य फल प्राप्त नहीं होता है।  तुलादान से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं, व्यक्ति जीवनकाल में सुखों का भोग करता है और अंत समय में मोक्ष को प्राप्त होता है।

कैसे शुरू हुई परंपरा

भगवान विष्णु के कहने पर ब्रह्मा जी ने तुलादान को तीर्थों का महत्व तय करने के लिए कराया था। साथ ही तुलादान से भगवान कृष्ण की एक कथा प्रचलित है। जिसके अनुसार, एक बार सत्यभामा ने श्रीकृष्ण पर अपना एकाधिकार जमाने के लिए नारद मुनि को दान में दिया। जब नारद मुनि कृष्ण को ले जाने लगे तब सत्यभामा को अपनी भूल का आभास हुआ। लेकिन सत्यभामा कृष्ण का दान कर चुकी थी, ऐसे में कृष्ण को दोबार पाने के लिए सत्यभामा ने नारद मुनि से उपाय पूछा। तब नारद मुनि ने सत्यभामा को भगवान कृष्ण का तुलादान करने की बात कही। फिर तराजू में एक तरफ श्रीकृष्ण और दूसरी तरफ स्वर्ण-मुद्राएं, गहने, अन्न आदि रखे गए। इसके बावजूद भी कृष्ण की ओर का पलड़ा नहीं ​हिला। तब रुक्मणी ने सत्यभामा को दान वाले पलड़े में एक तुलसी का पत्ता रखने को कहा। सत्यभामा ने जैसे ही तुलसी का पत्ता स्वर्ण-मुद्राओं, गहने और अन्न वाले पलड़े में रखा तो यह श्रीकृष्ण के पलड़े के बराबर हो गया। उस दौरान श्रीकृष्ण ने तुलादान को महादान के बराबर बताया, जिससे सभी पापों से मुक्ति मिलती है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

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