Election Symbol Dispute: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के टीएमसी के पारंपरिक 'फूल और घास के चिन्ह' को फ्रीज करने के फैसले को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को चुनाव आयोग से पूछा कि तृणमूल कांग्रेस के मूल नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर चल रहे विवाद का फैसला वह कब तक कर सकता है, साथ ही इस बात पर जोर दिया कि अंतरिम अवधि में दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वकील को विवाद के निपटारे की समय सीमा के संबंध में निर्देश प्राप्त करने और अदालत को सूचित करने का आदेश दिया। इस मामले पर सोमवार को फिर सुनवाई होगी।
क्या है पूरा मामला?
यह सुनवाई पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी द्वारा आंतरिक गुटबाजी विवाद के बीच अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक 'फूल और घास' चिन्ह को निलंबित करने के चुनाव आयोग के अंतरिम निर्णय को चुनौती देने के बाद हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले बनर्जी की याचिका पर तत्काल सुनवाई करने पर सहमति जताई थी। 17 सितंबर को चुनाव आयोग ने एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें कहा गया कि दो प्रतिद्वंद्वी समूह अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस होने का दावा कर रहे हैं और इस विवाद के लिए चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अनुच्छेद 15 के तहत ठोस निर्धारण की आवश्यकता है।
चुनाव आयोग ने क्या कहा?
आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा उपचुनावों के लिए अंतरिम व्यवस्था के रूप में, चुनाव आयोग ने बाद में दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फुटबॉल खिलाड़ी' का चुनाव चिन्ह दिया गया, जबकि प्रतिद्वंद्वी गुट, अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' और 'लिफाफा' का चुनाव चिन्ह आवंटित किया गया। यह व्यवस्था नंदीग्राम और रेजिनगर में 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनावों पर लागू होती है, जहां दोनों गुटों ने उम्मीदवार उतारे हैं। चुनाव आयोग ने कहा था कि ये अस्थायी उपाय प्रतिद्वंद्वी गुटों को समान स्तर पर लाने और मुख्य विवाद के निपटारे तक उनके हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से किए गए हैं।
ममता बनर्जी के तरफ से आया तर्क
ममता बनर्जी ने पार्टी की स्थापित पहचान और चिन्ह को फ्रीज किए जाने को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की। इस सप्ताह की शुरुआत में जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया, तो बनर्जी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए तर्क दिया कि चुनाव आयोग ने उपचुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद चिन्ह को फ्रीज किया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने तब टिप्पणी की थी कि दोनों पक्षों को अपनी-अपनी दलीलें पेश करनी होंगी।
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