क्या हैं सूतक और पातक काल? जानिए इनका सूर्य ग्रहण और मानव जीवन से क्या है संबंध

क्या हैं सूतक और पातक काल? जानिए इनका सूर्य ग्रहण और मानव जीवन से क्या है संबंध

नई दिल्लीसूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण से पहले लगने वाले सूतक काल को भारत में काफी गंभीरता से लिया जाता है। सूतक काल में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा नहीं की जाती है और कई महत्वपूर्ण कार्य भी वर्जित होते हैं।

सूतक की भाँति पातक परम्परा भी है। आइए जानें सूतक और पातक क्या हैं और इन्हें कब और कितनी बार लगाया जाता है।ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहण के अलावा सूतक और पातक का जन्म और मृत्यु से गहरा संबंध होता है। और इन दोनों का ही व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

सूतक क्या है?

सूतक का समय ग्रहण और जन्म के समय की अशुद्धियों के कारण होता है। जब घर में संतान का जन्म होता है तो उसके परिवार में सूतक लग जाता है। इस दौरान बच्चे के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य किसी भी धार्मिक गतिविधियों में शामिल नहीं होते हैं। यहां तक ​​कि बच्चे की मां को भी छठ पूजा तक घर की रसोई में जाने की मनाही होती है। जबकि सूर्य ग्रहण के सूतक काल में मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। सभी प्रकार की पूजा भी वर्जित है।

पाटक क्या है?

गरुड़ पुराण के अनुसार जब परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होती है तो 'पातक' होता है। इसमें मृत व्यक्ति के परिजनों को 12या 13दिनों तक पातक के नियमों का पालन करना होता है। इसमें घर के सदस्यों के किचन में जाने या कुछ भी पकाने की मनाही होती है। पातक काल में पूजा और शुभ कार्य भी नहीं किए जाते हैं।

परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के अलावा, गर्भपात कराने वाली महिला और पालतू जानवर की मृत्यु के अलावा पातक के नियमों का सख्ती से पालन करना चाहिए।किसी व्यक्ति की मृत्यु से फैली हुई अशुद्धता के कारण पातक काल होता है। वैसे तो पातक काल डेढ़ महीने तक रहता है, लेकिन मृतक के दाह संस्कार की तारीख से 13दिनों तक इसका सख्ती से पालन करना होता है। मृतक की अस्थियों के विसर्जन, पवित्र नदी में स्नान करने और ब्राह्मण को भोजन कराने के बाद ही पातक समाप्त होता है।

हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार जन्म और मृत्यु के दौरान सूतक और पताक जैसे नियमों का पालन किया जाता है। शास्त्रों में परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु पर शोक व्यक्त करने के लिए पूरे 13 दिनों तक पातक का विधान है। इसी तरह जब घर में नवजात का जन्म होता है तो एक धागा होता है। हालांकि अलग-अलग जगहों पर इसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है। जैसे इसे महाराष्ट्र में वृद्धि, राजस्थान में सनावद और मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार आदि उत्तरी राज्यों में सूतक के नाम से जाना जाता है।

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