भविष्य में गायब हो सकते है बद्रीनाथ और केदारनाथ के तीर्थ स्थल! जानें अफवाह या हकीकत

भविष्य में गायब हो सकते है बद्रीनाथ और केदारनाथ के तीर्थ स्थल! जानें अफवाह या हकीकत

नई दिल्लीतीर्थ यात्राएं मनुष्‍य की आस्‍था की परिक्षाएं लेती रही हैं। भारत के कई तीर्थस्‍थल आज भी बेहद दुर्गम मार्गों पर स्थित हैं। जिन में से एक बद्रीनाथ और केदारनाथ है। वही ऐसा कहा जाता है कि जो जाए बद्री वह ना आए ओदरी अर्थात जो बद्रीनाथ के दर्शन कर ले उस इंसान को दोबारा मां के गर्भ में आने की जरूरत नहीं पड़ती हैं। उत्तराखंड राज्य में अलकनंदा के किनारे और नर-नारायण के पहाड़ों के बीच बसा है भगवान विष्णु का वैकुंठ लोक जिसे आज दुनिया बद्रीनाथ के नाम से जानती हैं। जो भारत के चार धामों में से एक हैं।

इस के साथ बद्रीनाथ मंदिर का नाम बद्रीनाथ इसलिए पड़ा क्योंकि यहां प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली जंगली बेर को बद्री कहते हैं। पुराणों के अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ और केदारनाथ धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्य वर्दी नामक एक तीर्थ का उदम होगा। यह भी मान्यता है कि जोशीमठ में स्थित नरसिंह भगवान की मूर्ति का एक हाथ साल दर साल पतला होता जा रहा है, जिस दिन यह हाथ लुप्त हो जाएगा उस दिन केदारनाथ तीर्थ स्थल और बद्रीनाथ भी लुप्त होना प्रारंभ हो जाएंगे।

वही हिंदू शास्त्र के अनुसार बद्रीनाथ की यात्रा के बिना सारे तीर्थ यात्राएं अधूरी हैं। जब-जब धरती पर अधर्म का बोझ बढ़ा हैं तब-तब अपने भक्तों को कष्टों से उभारने के लिए भगवान विष्णु ने जन्म लिया हैं। जिस तरह त्रेतायुग में रामेश्वरम, द्वापर युग का द्वारका और कलयुग का धाम जगन्नाथ पुरी को माना गया हैं उसी तरह सतयुग का धाम बद्रीनाथ को माना गया हैं।बता दें कि, ऐसा माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम में आज भी भगवान विष्णु, बद्रीनारायण के रूप में तप कर रहे हैं। कहते है यहां जो भी आता है उसकी मनोकामना पूरी जरूर होती हैं। भगवान बद्री के दर्शन की उम्मीद लिए, मन में आस्था का दीप जलाए भारी संख्या में भक्तों की यहां कतार लगती हैं।

कैसे पड़ा बद्रीनाथ मंदिर का नाम                                          

भगवान लक्ष्मी जी भगवान विष्णु को वर्षा और हिम से बचाने के लिए कठोर तपस्या में जुट गई।कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु का तब पूरा हुआ तो देखा कि लक्ष्मी जी हिम से ढकी पड़ी हैं।तब उन्होंने माता लक्ष्मी को देख कर के कहा कि मेरे साथ तो आपने भी तप किया है तो इसलिए इस धाम पर मेरे साथ तुम्हें ही पूजा जाएगा और तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है इसलिए आज से मेरा नाम बद्रीनाथ के नाम से दुनिया में प्रसिद्ध होगा।

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