Bakrid Qurbani: देशभर में आज 28 मई गुरुवार को बकरीद यानी ईद-उल-अजहा का पावन त्योहार बड़े उत्साह मनाया जा रहा है। मस्जिदों में ईद की नमाज अदा की गई, तकबीरों की गूंज उठी और लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं। बकरीद को ईद-उल-अजहा या त्याग का त्योहार भी कहा जाता है। इस मौके पर कुर्बानी का सिलसिला शुरू हो गया है, जो अगले दो दिनों तक जारी रहेगा। यह त्योहार हज की समाप्ति के साथ जुड़ा हुआ है और मुस्लिम समुदाय के लिए आस्था, त्याग और भाईचारे का प्रतीक है।
क्यों मनाई जाती है बकरीद?
इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार, 12वें महीने जु-अल-हिज्जा की 10 तारीख को बकरीद मनाई जाती है। जो रमजान के पवित्र महीने के खत्म होने के लगभग 70 दिनों के बाद आती है। इस्लामिक मान्यताओं की मानें तो इस पर्व का इतिहास हजरत इब्राहिम से जुड़ा है। जो अपने सपने में देखते है कि उन्होंने अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे हजरत इस्माइल की कुर्बानी की तैयारी की थी। लेकिन अल्लाह की कृपा से बेटे की जगह एक मेमना भेज दिया गया। तभी से कुर्बानी की परंपरा शुरू हुई।
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तीन दिनों तक क्यों दी जाती है कुर्बानी?
इस्लाम धर्म में कुर्बानी का महत्व विशेष है। यह जिल्हिज्जा महीने की 10वीं, 11वीं और 12वीं तारीख को दी जाती है। यानी ईद के दिन से शुरू होकर अगले दो दिन तक कुल तीन दिन कुर्बानी का समय होता है।
पहला दिन (10 जिल्हिज्जा): ईद की नमाज के बाद कुर्बानी शुरू होती है।
दूसरा और तीसरा दिन (11,12 जिल्हिज्जा): तशरीक के दिन कहलाते हैं, जिनमें कुर्बानी जारी रहती है।
तीन दिन का यह समय इसलिए रखा गया है ताकि हज करने वाले और घर पर रहने वाले सभी मुसलमान इस फर्ज को आराम से पूरा कर सकें। कुर्बानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है। एक हिस्सा परिवार के लिए, दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए और तीसरा जरूरतमंदों के लिए रखा जाता है। यह त्योहार सिर्फ कुर्बानी नहीं, त्याग, इंसानियत और जरूरतमंदों की मदद का संदेश देता है।