UGC के नियमों को लेकर दिल्ली में जोरदार प्रोटेस्ट, सड़कों पर उतरे टीचर्स-स्टूडेंट्स; जानें इस बवाल का कारण

UGC के नियमों को लेकर दिल्ली में जोरदार प्रोटेस्ट, सड़कों पर उतरे टीचर्स-स्टूडेंट्स; जानें इस बवाल का कारण

UGC Guidelines 2026Controversy:विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए 'उच्च शिक्षा संस्थानों में इक्विटी को बढ़ावा देने के नियम, 2026' ने पूरे देश में हंगामा मचा दिया है। ये नियम जाति-आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य से लाए गए हैं, लेकिन इनकी वजह से जनरल कैटेगरी के छात्रों और शिक्षकों में गहरा असंतोष फैल गया है। दिल्ली स्थित UGC मुख्यालय के बाहर आज सैकड़ों छात्र विरोध-प्रदर्शन कर रहे है, जहां पुलिस ने बैरिकेड्स लगा रखे हैं और सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। प्रदर्शनकारी इन नियमों को 'रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन' करार दे रहे हैं और इन्हें वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

UGC हेडक्वार्टर के बाहर प्रोटेस्ट

दिल्ली में UGC मुख्यालय के बाहर प्रदर्शन आज सुबह से जारी हैं। छात्र संगठन जैसे करणी सेना, ब्राह्मण महासभा और अन्य सामान्य वर्ग के ग्रुप्स ने विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया है। सोशल मीडिया पर #RollbackUGC और #NoUGCRollBack_NoVote जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। राजस्थान, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में भी विरोध हो रहे हैं। कई जगहों पर छात्रों ने कैंपस में पोस्टर लगाए और सड़कों पर उतर आए।

बता दें, ये नियम साल 2012 के पुराने दिशानिर्देशों की जगह लेते हैं, जिसे 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया। UGC का कहना है कि उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की शिकायतें पिछले पांच सालों में 118.4% बढ़ी हैं, जो 2019-20 में 173 से बढ़कर 2023-24 में 378 हो गई हैं। तो वहीं, आलोचकों का कहना है कि ये नियम संविधान के अनुच्छेद 14 (कानून के समक्ष समानता) का उल्लंघन करते हैं और सामान्य वर्ग को 'दोषी' मानकर चलते हैं।

ये नियम बने विरोध-प्रदर्शन की वजह

बता दें, UGC के इन नए नियमों में कई प्रावधान हैं, लेकिन मुख्य रूप से कुछ ऐसे नियम हैं जिन पर सबसे ज्यादा बवाल मचा हुआ है। ये नियम उच्च शिक्षा संस्थानों को अनुपालन के लिए बाध्य करते हैं और गैर-अनुपालन पर UGC की मान्यता वापस लेने या फंडिंग रोकने जैसे दंड का प्रावधान है।

1. जातिगत भेदभाव की विस्तारित और अस्पष्ट परिभाषा:UGC के नए नियम में भेदभाव की परिभाषा को व्यापक बनाया गया है, जिसमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष, जानबूझकर या अनजाने में होने वाले व्यवहार शामिल हैं। इसमें SC, ST और OBC को पीड़ित के रूप में शामिल किया गया है, लेकिन सामान्य वर्ग को बाहर रखा गया है। आलोचकों का कहना है कि इससे सामान्य वर्ग के छात्रों को उत्पीड़क मान लिया गया है और कोई भी सामान्य बातचीत या फैसला भेदभाव का आरोप बन सकता है।

2. इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर (EOC) का गठन:UGC के नए नियम के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज को एक इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर स्थापित करना होगा, जो भेदभाव की शिकायतों को संभालेगा, निगरानी करेगा और नीतियां लागू करेगा। इसमें SC, ST, OBC, महिलाओं और दिव्यांगों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। लेकिन विरोध करने वाले कहते हैं कि इससे कैंपस का माहौल बिगड़ेगा और NGOs या बाहरी तत्वों का हस्तक्षेप बढ़ेगा।

3. इक्विटी कमिटी का गठन और रिपोर्टिंग:संस्थानों को इक्विटी कमिटी बनानी होगी, जिसमें OBC, SC, ST, महिलाओं और दिव्यांगों के सदस्य होंगे। यह कमिटी शिकायतों की जांच करेगी और UGC को हर छह महीने में रिपोर्ट देगी। समय सीमा सख्त है - शिकायत पर 24 घंटे में मीटिंग, 15 दिनों में रिपोर्ट और 7 दिनों में कार्रवाई करना आवश्यक है। लेकिन आलोचक कहते है कि इससे प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा और सामान्य वर्ग के सदस्यों की अनुपस्थिति से एकतरफा फैसले होंगे।

4. फर्जी शिकायतों पर कोई दंड नहीं और सख्त अनुपालन: नियमों में फर्जी शिकायतों पर कोई सजा का प्रावधान नहीं है, जबकि संस्थानों पर गैर-अनुपालन के लिए कड़े दंड हैं। इससे झूठे आरोपों का डर बढ़ गया है। दूसरी तरफ, आलोचकों का कहना है कि दोषी जब तक निर्दोष साबित न हो का सिद्धांत लागू करता है।  

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