एक राज्यपाल एक बार में कितने राज्यों की संभाल सकता है कमान? जानें कितना मिलता है वेतन

एक राज्यपाल एक बार में कितने राज्यों की संभाल सकता है कमान? जानें कितना मिलता है वेतन

Governer Appointment Process: गुरुवार यानी 5 मार्च को कई राज्यों के राज्यपाल बदले गए। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल ने इस्तीफा दे दिया। इसके अलावा लद्दाख के भी उप राज्यपाल बदले गए। अब दिल्ली को भी नया उपराज्यपाल मिल गया है।  

वहीं, देर राष्ट्रपति की ओर से आरएन रवि को बंगाल का नया गवर्नर बनाया गया है। केरल के राज्यपाल राजेंद्र अर्लेकर को तमिलनाडु का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। अब सवाल है कि एक राज्यपाल एक बार में कितने राज्यों का प्रभार संभाल सकता है? उनकी नियुक्ति कैसे होती है और योग्यता क्या होनी चाहिए? 

कैसे होती है राज्यपाल की नियुक्ति

भारत के संविधान के अनुच्छेद 153 के मुताबिक, सभी राज्यों के लिए एक राज्यपाल होगा। अनुच्छेद 155 के तहत राष्ट्रपति राज्यपाल की नियुक्ति करते हैं। राष्ट्रपति उसी को राज्यपाल नियुक्त करते है। जिनके नाम का कैबिनेट मंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से प्रस्ताव दिया जाता है। मतलब साफ है कि राज्यपाल की नियुक्ति में केंद्र सरकार का अहम रोल है। सामान्य तौर पर राज्यपाल का कार्यकाल पांच साल का होता है। वहीं, संविधान के अनुच्छेद 156 के तहत राष्ट्रपति जब चाहें, राज्यपाल को हटा सकते हैं।        

एक बार में कितने राज्यों का प्रभार

वर्तमान में केरल के राज्यपाल को तमिलनाडु का प्रभार दिया गया है। ऐसे में सवाल उठने लगा है कि एक राज्यपाल को कितने राज्यों का अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है। बता दें कि संविधान में इस बात का कोई जिक्र नहीं है कि एक राज्यपाल को कितने राज्यों का प्रभार दिया जा सकता है। यह पूरी तरह से राष्ट्रपति और केंद्र सरकार पर निर्भर करता है। यदि एक राज्यपाल दो या दो से अधिक राज्यों का कार्यभार संभाल रहे हैं, तो उन्हें मिलने वाला वेतन उन राज्यों के बीच उस अनुपात में बांटे जाते हैं।

राज्यपाल बनने के लिए योग्यता

संविधान के अनुच्छेद 157 और 158 के तहत राज्यपाल बनने के लिए योग्यताओं और शर्तें का जिक्र किया गया है। राज्यपाल बनने के लिए भारत का नागरिक होना जरूरी है। उम्र 35 वर्ष होना आवश्यक है। इसके अलावा राज्यपाल बनने के लिए व्यक्ति को किसी सदन का सदस्य नहीं होना अनिवार्य है। राज्यपाल पद पर नियुक्ति के लिए व्यक्ति का किसी भी लाभ के पद पर तैनात नहीं होना भी जरूरी है। कई बार नियुक्ति से पहले संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श करने की भी एक अनौपचारिक परंपरा रही है। 

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