
India Strengthen Relations With Taliban: विदेश नीति में ‘नेबरहुड फर्स्ट’ की नीति को बेहद अहम माना जाता है। हाल ही में दुबई में भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्त्री ने तालिबान के कार्यकारी विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी से मुलाकात की। इस बातचीत ने भारत और तालिबान के रिश्तों को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
बता दें कि,2021में जब तालिबान ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो भारत ने उससे दूरी बना ली थी। लेकिन चार साल बाद अब भारत ने तालिबान के साथ उच्च-स्तरीय बातचीत शुरू कर अपनी नई रणनीति का संकेत दिया है।
अफगानिस्तान में भारत का निवेश
तालिबान के सत्ता में आने से पहले भारत ने अफगानिस्तान में 500से ज्यादा परियोजनाओं पर करीब तीन अरब डॉलर का निवेश किया। इन परियोजनाओं में सड़कें, बिजली, अस्पताल, बांध और नया संसद भवन शामिल हैं। भारत ने अफगान छात्रों को छात्रवृत्ति और अफगान अधिकारियों को प्रशिक्षण भी दिया।
यह वार्ता इस बात का संकेत है कि भारत अपने निवेश को सुरक्षित रखना चाहता है और अफगानिस्तान में स्थिरता लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
तालिबान के लिए भारत क्यों जरूरी है?
भारत जैसे देश के साथ अच्छे संबंध तालिबान के लिए भी अहम हैं। अभी तक तालिबान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता नहीं मिली है। भारत के साथ कूटनीतिक रिश्ते उसकी वैश्विक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं।
इसके अलावा, पाकिस्तान और तालिबान के बिगड़ते रिश्ते इस समीकरण को और खास बनाते हैं। भारत के लिए यह मौका तालिबान के साथ संबंध बेहतर करने का सही समय है।
चाबहार बंदरगाह और व्यापार
बातचीत में ईरान के चाबहार बंदरगाह का उपयोग और व्यापार बढ़ाने पर चर्चा हुई। चाबहार बंदरगाह भारत के सामरिक हितों के लिए बेहद अहम है। तालिबान ने भारत को एक मजबूत क्षेत्रीय ताकत मानते हुए सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई।
दोस्ती के नुकसान और फायदे
तालिबान अपनी कठोर नीतियों और मानवाधिकार उल्लंघन के लिए बदनाम है। महिलाओं के अधिकारों पर पाबंदियां भारत की साख पर असर डाल सकती हैं। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि कूटनीतिक और आर्थिक फायदे इन जोखिमों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं।
भारत और तालिबान के बढ़ते रिश्ते क्षेत्रीय स्थिरता और भारत की सामरिक स्थिति को मजबूत कर सकते हैं। बदलते राजनीतिक हालात में यह पहल भारत के लिए एक नए अवसर के रूप में उभर रही है।
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