
Supreme Court: हिंदू धर्म में गुरु को परमब्रह्म का स्वरूप बताते हुए कहा गया है 'गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः, गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।' यानी गुरु ही सृष्टि के रचयिता, पालक और संहारक हैं, जो अज्ञानता के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देते हैं। लेकिन हाल ही में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इस श्लोक का हवाला देते हुए कड़ी टिप्पणी की, जब एक शिक्षक पर गंभीर आरोप लगे। कोर्ट ने कहा कि अगर उन्हें सम्मानजनक वेतन नहीं मिल पा रहा है तो गुरु का जाप करना पर्याप्त नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट की यह टिपण्णी गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले पर सामने आई है। बता दें, साल 2022में गुजरात हाई कोर्ट में एक शिक्षक की जमानत याचिका पर सुनवाई की। आरोपी शिक्षक का नाम निहार बराड़ था, जिसने जुलाई 2022में 12साल की छात्रा के साथ यौन शोषण की वारदात को अंजाम दिया। पीड़िता ने अपने माता-पिता को इसकी जानकारी दी, जिसके बाद स्कूल प्रबंधन और फिर पुलिस में शिकायत दर्ज की गई।
इस मामले में जस्टिस समीर दवे की एकल पीठ ने न केवल आरोपी शिक्षक की जमानत याचिका खारिज की, बल्कि गुरु की महिमा को दर्शाने वाले उपरोक्त श्लोक का उल्लेख करते हुए शिक्षक की भूमिका पर गहरी नाराजगी जताई। वहीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया और शिक्षक जैसे सम्मानित पद की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले कृत्य को अस्वीकार्य बताया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में शिक्षक की हरकत को 'विश्वासघात' और 'सामाजिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाने वाला' करार दिया। कोर्ट ने कहा कि शिक्षक को समाज में रक्षक की भूमिका निभानी चाहिए, न कि ऐसी हरकत करनी चाहिए जो एक बच्ची के जीवन पर ताउम्र नकारात्मक प्रभाव डाले। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि गुरु का स्थान समाज में सर्वोच्च है, और जब कोई शिक्षक इस विश्वास को तोड़ता है, तो यह न केवल उस व्यक्ति की मर्यादा को चोट पहुंचाता है, बल्कि पूरे समाज के नैतिक ढांचे को कमजोर करता है।
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