कारगिल में उतरे कैप्टन विक्रम बत्रा कैसे बने 'शेरशाह', जानें साहस भरे बलिदान की दास्तान

कारगिल में उतरे कैप्टन विक्रम बत्रा कैसे बने 'शेरशाह', जानें साहस भरे बलिदान की दास्तान

Captain Vikram Batra: कैप्टन विक्रम बत्रा एक ऐसा नाम है जो कारगिल युद्ध के दौरान हर किसी की जुबान पर था, ऐसा नहीं है आज के समय में अब इस नाम से कोई अनजान हो। आज भी कैप्टन विक्रम बत्रा के नाम और उनकी बहादुरी से हर कोई अच्छी तरह परिचित है। बता दें कि, कैप्टन विक्रम बत्रा को प्यार से शेरशाह कहा जाता था, कैप्टन विक्रम बत्रा के साहसिक साहस के कारण उनके नाम से भी खौफ पैदा होता था। बत्रा ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया, जो इस देश के लिए पुरानी विचारधारा को दर्शाता है। कारगिल युद्ध के शेरशाह को यह देश हमेशा याद रखेगा और हर दिल में उनके द्वारा देश के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

शेरशाह के बलिदान की कहानी

परमवीर चक्र विजेता कैप्टन बत्रा 7 जुलाई 1999 को कारगिल युद्ध के दौरान देश के लिए शहीद हो गए थे। कैप्टन बत्रा ने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया था, कैप्टन बत्रा के नाम से दुश्मन कांपते थे, बत्रा को दुश्मनों ने शेरशाह नाम भी दिया था क्योंकि बत्रा के नाम का खौफ दुश्मनों में साफ दिखता था।  विक्रम बत्रा की शहादत और उनकी बहादुरी के कारण प्वाइंट 4875 का नाम बत्रा टॉप रखा गया। आपको बता दें कि 5 जून 1999 को विक्रम बत्रा की बटालियन को द्रास पहुंचने का आदेश दिया गया था, फिर 13 J&K राइफल्स बटालियन 6 जून को द्रास पहुंची, उन्हें दूसरी बटालियन राजपूताना राइफल्स के लिए रिजर्व में रहने का आदेश दिया गया।18 ग्रेनेडियर्स बटालियन को तोलोलिंग पर कब्ज़ा करने का आदेश दिया गया, 4 कोशिशों के बाद बटालियन इस पर कब्ज़ा करने में कामयाब रही और बटालियन को भारी नुकसान हुआ। इन सबके बाद 13 जून 1999 को राजपूताना राइफल्स को पहाड़ की चोटी से आतंकवादी घुसपैठियों को खदेड़ने का काम सौंपा गया और टोलोलिंग पर्वत और हंप कॉम्प्लेक्स के एक हिस्से को भी जीत लिया गया।

विक्रम बत्रा का ये दिल मांगे मोर

आपको बताते हैं कि आखिर ये दिल मांगे मोर कैसे आया जिसने हर युवाओ की जिंदगी बदल कर रख दी। दरअसल तोलोलिंग मिशन पूरा होने के बाद तत्कालीन कमांडिंग अफसर योगेश कुमार जोशी ने प्वाइंट 5140 को जीतने की योजना तैयार की थी जिसके बाद जोशी ने दो टीम बनाई जिसमें पहली टीम का नेतृत्व लेफ्टिनेंट संजीव सिंह जामवाल कर रहे थे। वहीं दूसरी टीम की कमान विक्रम बत्रा संभाल रहे थे। दो टीमों का गठन इसलिए किया गया था, क्यूंकि प्वाइंट 5140 पर कब्ज़ा करने के लिए दुष्मनों पर दो तरफ से हमला करना जरुरी था। कमांडिंग ऑफिसर जोशी ने उस समय बत्रा से जीत के लिए मंत्र चुनने को कहा तब बत्रा ने अपनी जीत का मंत्र यह दिल मांगे मोर चुना था।

घायल सैनिक की मदद करते समय गोली के हुए शिकार

कैप्टन बत्रा की टीम के 2 सैनिक लड़ाई के दौरान घायल हो गए थे, बत्रा उनके एक साथ घायल सैनिकों को उठाकर नीचे ले जा रहे थे तभी मौके का फ़ायदा उठाते हुए पाकिस्तानी स्नाइपर ने बत्रा के सीने में गोली मार दी और RPGके हमले के दौरान निकले छर्रे से उनके सर में भी चोट लग गई। बत्रा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था।

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