Netherlands Return Chola Copper Plates to India: इस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड यात्रा पर हैं। इस दौरान एक ऐसा ऐतिहासिक पल आया, जब नीदरलैंड सरकार ने 11वीं सदी के चोल काल के तांबे के ताम्रपत्र भारत को औपचारिक रूप से लौटा दिए। बता दें, इन ताम्रपत्रों को डच ईस्ट इंडिया कंपनी लूटकर नीदरलैंड ले गई थी। लेकिन अब ये भारत को वापस मिल गई है। बीते दिन हेग में आयोजित समारोह में नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रोब जेटेन ने इन ताम्रपत्रों को PM मोदी को सौंपा। जिसे PM मोदी ने इसे 'हर भारतीय के लिए गर्व का पल' बताया।
PM मोदी का बयान
नीदरलैंड में समारोह के बाद PM मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट किया। उन्होंने लिखा 'चोल ताम्रपत्र 21 बड़े और 3 छोटे प्लेटों का संग्रह हैं, जिनमें ज्यादातर शिलालेख तमिल भाषा में हैं, जो दुनिया की सबसे खूबसूरत भाषाओं में से एक है। ये राजराज चोल प्रथम द्वारा दिए गए मौखिक वादे को उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम द्वारा औपचारिक रूप देने की कहानी बताते हैं। चोलों की महानता, उनकी संस्कृति और समुद्री साम्राज्य पर हम भारतवासी गर्व करते हैं।” इसी के साथ उन्होंने नीदरलैंड सरकार का आभार भी जताया।
இந்தியர் அனைவருக்கும் ஒரு மகிழ்ச்சிகரமான தருணம்!
— Narendra Modi (@narendramodi) May 16, 2026
11-ம் நூற்றாண்டைச் சேர்ந்த சோழர்கால செப்பேடுகள், நெதர்லாந்தில் இருந்து இந்தியாவிற்குத் திரும்பவும் கொண்டுவரப்பட இருக்கின்றன. இது தொடர்பான விழாவில் பிரதமர் ராப் ஜெட்டன் அவர்களுடன் இணைந்து பங்கேற்றேன்.
சோழர் கால செப்பேடுகள், 21… pic.twitter.com/af4NWacMwt
बता दें, चोल राजवंश ने न केवल दक्षिण भारत बल्कि समुद्र पार तक अपना प्रभाव फैलाया था। वहीं, अब इन ताम्रपत्रों की वापसी से भारत की सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली इतिहास को फिर से जीवंत कर दिया है। जानकारी के अनुसार, ये ताम्रपत्र कुछ हफ्तों में भारत पहुंचेंगे और पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंपे जाएंगे, जहां इन्हें संरक्षित कर बाद में जनता के लिए प्रदर्शित किया जाएगा।
ताम्रपत्रों की खासियत क्या है?
दरअसल, ये ताम्रपत्र कुल 24 प्लेटों (21 बड़े और 3 छोटे) का संग्रह हैं, जिनका वजन लगभग 30 किलोग्राम है। इन्हें चोल राजवंश की राजसी मुहर वाले कांस्य के छल्ले से बांधा गया है। राजराज चोल प्रथम (985-1014 ईस्वी) के शासनकाल में शुरू हुई इन पट्टिकाओं को बाद में उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने स्थायी रूप देने के लिए तांबे पर उत्कीर्ण करवाया। इनमें तमिल और संस्कृत भाषा का समावेश देखने को मिलता है।
इसके अलावा इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये चोल साम्राज्य के प्रशासन, भूमि अनुदान प्रणाली और धार्मिक सहिष्णुता का जीवंत प्रमाण हैं। इनमें नागपट्टिनम (तमिलनाडु) के अनैमंगलम गांव को बौद्ध विहार 'चूड़ामणिवर्म विहार' को दिए गए भूमि अनुदान और राजस्व की जानकारी दर्ज है। ये प्लेटें चोल काल के समुद्री व्यापार, दक्षिण-पूर्व एशिया से सांस्कृतिक आदान-प्रदान और हिंदू-बौद्ध सह-अस्तित्व को उजागर करती हैं।
कैसे गए थे नीदरलैंड?
ये ताम्रपत्र 17वीं-18वीं शताब्दी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी के काल में नागपट्टिनम से अनजाने में निकाले गए थे। जिसके बाद इन्हें नीदरलैंड लाया गया, जहां 1862 में इन्हें लीडेन विश्वविद्यालय को दान कर दिया गया। इसके बाद भारत ने 2012 से ही इनकी वापसी की मांग की थी। 14 साल के कूटनीतिक प्रयासों, यूनेस्को की अंतरसरकारी समिति की मदद और नीदरलैंड की 2022 की नई पुनर्स्थापना नीति के बाद यह सफल हुआ। लीडेन विश्वविद्यालय की ओर से गठित समिति ने 2025 के अंत में इनकी भारत वापसी की सिफारिश की थी।