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जनगणना में दिखेगा नया माइग्रेशन ट्रेंड, छोटे शहर बन रहे नए ग्रोथ हब

Shivani Jha | 30 Apr, 2026

Census 2026: भारत में चल रही जनगणना इस बार सिर्फ आबादी गिनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में हो रहे बड़े सामाजिक और आर्थिक बदलावों को भी सामने ला रही है। खासकर कोविड-19 के बाद लोगों के रहने और काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है, जिससे माइग्रेशन का नया पैटर्न उभर रहा है। साल 2020 के लॉकडाउन के दौरान देश ने बड़े पैमाने पर रिवर्स माइग्रेशन देखा। लाखों मजदूर और कर्मचारी बड़े शहरों से अपने गांव और छोटे शहरों की ओर लौट गए। लेकिन यह बदलाव अस्थायी नहीं रहा, बल्कि अब कई लोग स्थायी रूप से छोटे शहरों में बसने लगे हैं।

कई शहरों में उभर रहा माइग्रेशन

वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल इकोनॉमी के बढ़ने से लोगों को अब बड़े शहरों में रहने की मजबूरी कम हो गई है। यही कारण है कि अब माइग्रेशन सिर्फ जरूरत नहीं, बल्कि एक विकल्प बन गया है। इंदौर, लखनऊ, कोयंबटूर, जयपुर और सूरत जैसे शहर तेजी से नए ग्रोथ हब बनकर उभर रहे हैं। यहां जीवन खर्च कम है, कनेक्टिविटी बेहतर हो रही है और रोजगार के मौके भी बढ़ रहे हैं। अब लोग इन शहरों में सिर्फ रहने ही नहीं, बल्कि करियर बनाने के लिए भी जा रहे हैं।

बड़े शहरों में कई तरह की समस्या 

वहीं दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में महंगी हाउसिंग, ट्रैफिक और प्रदूषण जैसी समस्याएं बनी हुई हैं। इन कारणों से कुछ लोग इन शहरों को छोड़कर वापस छोटे शहरों की ओर जा रहे हैं। हालांकि, बड़े शहरों का महत्व अभी भी कम नहीं हुआ है। नई नौकरियां, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं अब भी इन्हीं शहरों में केंद्रित हैं। इसलिए युवाओं का इन शहरों की ओर आना जारी है। 

छोटे शहर बन सकते है मिनी-मेट्रो 

नई जनगणना के आंकड़ों से यह साफ हो सकता है कि अब माइग्रेशन एकतरफा नहीं रहा। लोग बड़े शहरों में जा भी रहे हैं और वहां से लौट भी रहे हैं। यानी यह ‘टू-वे फ्लो’ बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में छोटे शहर मिनी-मेट्रो के रूप में विकसित होंगे, जबकि बड़े शहर आर्थिक केंद्र बने रहेंगे। इस बदलते ट्रेंड का असर सरकार की नीतियों और बजट पर भी पड़ेगा। अब इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का फोकस छोटे शहरों की ओर बढ़ेगा। जनगणना के ये आंकड़े आने वाले समय की प्लानिंग और विकास की दिशा तय करेंगे।

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