Allahabad HC on Marriage Responsibilities: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेंटेनेंस (भरण-पोषण) मामले में एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों का खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, तो उसे शादी ही नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शादी के बाद पति कानूनी रूप से परिवार के भरण-पोषण के लिए बाध्य होता है और खराब आर्थिक स्थिति का बहाना बनाकर इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?
दरअसल, यह टिप्पणी जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की डिविजन बेंच ने अपीलकर्ता तेज बहादुर मौर्य की फर्स्ट अपील को खारिज करते हुए की। फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एक बार शादी हो जाने के बाद पति अपनी पत्नी और बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से मुकर नहीं सकता। बेंच ने कहा 'जो लोग यह महसूस करते हैं कि अगर शादी में खटास आ जाती है तो वे अपनी पत्नी और बच्चों का भरण-पोषण नहीं कर पाएंगे, उन्हें शुरू में शादी ही नहीं करनी चाहिए थी।'
कोर्ट ने आगे कहा कि कानून के तहत पति को अपनी पत्नी का भरण-पोषण करना पड़ता है। आर्थिक तंगी का हवाला देकर मुकदमे के दौरान इस जिम्मेदारी से बचने की कोशिश स्वीकार्य नहीं है। हाईकोर्ट ने पति की याचिका खारिज कर दी और फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए मेंटेनेंस के आदेश को सही ठहराया।
पति गुजारा भत्ता देने से मना नहीं कर सकता
बता दें, यह फैसला उन मामलों में अहम माना जा रहा है जहां पति अपनी आय कम बताकर या अन्य बहाने देकर पत्नी और बच्चों को दिए जाने वाले गुजारा भत्ते से बचने की कोशिश करते हैं। ऐसे में कोर्ट ने जोर दिया कि वैवाहिक संबंधों में पति की जिम्मेदारी प्राथमिक है और इसे टाला नहीं जा सकता।