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सपनों के आशियाने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, क्या खत्म होगी बिल्डरों की मनमानी?

सपनों के आशियाने पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, क्या खत्म होगी बिल्डरों की मनमानी?

Supreme Court: भारत में रियल एस्टेट सेक्टर लंबे समय से विवादों का शिकार रहा है। जिस वजह से मध्यम-वर्गीय अपनी जीवन भर की कमाई लगाकर घर खरीदते हैं, लेकिन देरी, धोखाधड़ी और दिवालिया प्रोजेक्ट्स के कारण वे लोग फंस जाते हैं। वहीं, अब सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ने इस दिशा में एक नया मोड़ ला दिया है। 13सितंबर को आए इस ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने आवास को संविधान के अनुच्छेद 21के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया है। साथ ही, केंद्र सरकार को एक 'रिवाइवल फंड' बनाने का भी निर्देश दिया है। जिससे इन अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए ज़रूरी आर्थिक मदद दी जा सके।

SC ने अपने फैसले में क्या है?

बता दें, कोर्ट का यह फैसला मांसी ब्रार फर्नांडिस बनाम शुभा शर्मा (Mansi Brar Fernandes v. Shubha Sharma) और इससे जुड़े मामलों पर आधारित है। मामला नोएडा के एक आवासीय प्रोजेक्ट से जुड़ा था, जहां बिल्डर दिवालिया हो गया। हजारों घर खरीदारों ने अपनी पूरी राशि जमा कर दी, लेकिन प्रोजेक्ट रुक गया। इन खरीदारों ने इंसॉल्वेंसी एंड बाँकरूपत्सी कोड (IBC) के तहत अपनी शिकायतें दर्ज कीं, लेकिन राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपीलीय ट्रिब्यूनल (NCLAT) के फैसले से नाखुश लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

इस मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और आर. महादेवन की बेंच ने साफ कहा कि आवास का अधिकार केवल एक अनुबंधिक दायित्व नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार का अभिन्न अंग है। कोर्ट ने जोर दिया कि घर खरीदारों को समय पर, सुरक्षित और शांतिपूर्ण कब्जा मिलना चाहिए। यह फैसला IBC की कमियों को उजागर करता है, जहां अक्सर वित्तीय लेनदार (बैंक) के हितों को प्राथमिकता मिल जाती है, जबकि घर खरीदारों को 'वित्तीय लेनदार' मानकर उनकी आवाज दब जाती है।

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किए दिशा निर्देश

कोर्ट ने आगे कहा 'सरकार मूक दर्शक नहीं बन सकती। बिल्डरों के दिवालिया होने से न केवल खरीदार प्रभावित होते हैं, बल्कि बैंकिंग सेक्टर, सहायक उद्योग और लाखों नौकरियां भी खतरे में पड़ जाती हैं।' इसलिए कोर्ट ने सरकार के लिए दिशा निर्देश जारी किए है।

1. आवास को मौलिक अधिकार का दर्जा:अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत 'शेल्टर का अधिकार' को मजबूत किया गया। कोर्ट ने कहा कि देरी या धोखाधड़ी से खरीदारों का यह अधिकार प्रभावित नहीं हो सकता। इससे घर खरीदार अब संवैधानिक अदालतों में सीधे अपील कर सकेंगे। 

2. IBC और RERA में सुधार:केंद्र सरकार को निर्देश दिया गया कि IBC में संशोधन करे, ताकि घर खरीदारों को प्राथमिकता मिले। रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट (RERA) को मजबूत करने के लिए मॉडल बिल्डर-बायर एग्रीमेंट लागू करने का सुझाव दिया। इससे एकसमान नियम बनेंगे, जो बिल्डरों को मनमाने क्लॉज डालने से रोकेगा।

3. स्टेल्ड प्रोजेक्ट्स के लिए रिवाइवल फंड:कोर्ट ने सरकार से 'रिवाइवल फंड' बनाने की सिफारिश की, जो दिवालिया प्रोजेक्ट्स को पुनर्जीवित करेगा। यह फंड बैंक, सरकार और प्राइवेट निवेशकों से चलेगा, ताकि खरीदारों को बिना अतिरिक्त बोझ के घर मिल सके।

4. स्पेकुलेटिव निवेशकों पर रोक:कोर्ट ने साफ किया कि IBC का दुरुपयोग करने वाले सट्टेबाज निवेशकों को राहत नहीं मिलेगी, लेकिन वास्तविक घर खरीदारों (जिन्होंने 10%से अधिक पेमेंट किया हो) को प्राथमिकता दी जाएगी।

बिल्डरों पर क्या असर पड़ेगा?

कोर्ट का यह फैसला बिल्डरों के लिए चेतावनी है। पहले बिल्डर देरी पर केवल ब्याज चुकाते थे, लेकिन अब मौलिक अधिकार के दायरे में आते ही सख्त कार्रवाई संभव है। बता दें, इस कदम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि लोगों की जीवन भर की कमाई इस तरह के प्रोजेक्ट्स में न फंसे।

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