Vat Savitri Vrat Katha: हिंदू धर्म में वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक महत्व है। आज शनिवार 16 मई को ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर वट सावित्री व्रत मनाया जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और अखंड सौभाग्य की कामना करते हुए निर्जल व्रत रखती हैं और वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। यह व्रत पत्नी की पति-भक्ति और संकल्प शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
वट सावित्री व्रत का शुभ मुहूर्त
व्रत तिथि: 16 मई 2026 (शनिवार)
अमावस्या तिथि प्रारंभ: सुबह 5:11 बजे
अमावस्या तिथि समाप्त: 17 मई रात 1:30 बजे
वट सावित्री व्रत की पूजा सामग्री
गंगाजल, तांबे का कलश, रोली, कुमकुम, हल्दी, सिंदूर, अक्षत (चावल), कच्चा सूत/मौली/कलावा, घी का दीपक, अगरबत्ती, कपूर, लाल व पीले फूल, फूलमाला, पान, सुपारी, लौंग-इलायची, मौसमी फल, मिठाई, भीगे काले चने, तिल, सुहाग का सामान: लाल चूड़ियां, बिंदी, मेहंदी, काजल, चुनरी, सावित्री-सत्यवान की तस्वीर या मूर्ति, बांस का पंखा
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि
1. सबसे पहले प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
2. इसके बाद वट वृक्ष के नीचे या घर में बरगद की डाल रखकर पूजा स्थल तैयार करें।
3. वृक्ष को जल अर्पित करें, रोली-कुमकुम लगाकर दीपक जलाएं और धूप-अगरबत्ती करें।
4. इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें।
5. वृक्ष के चारों ओर 7, 11 या 108 बार परिक्रमा करें और कच्चा सूत या मौली लपेटें।
6. आखिर में सुहाग की सामग्री अर्पित कर आशीर्वाद लें।
सावित्री और सत्यवान की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, मद्र देश के राजा अश्वपति और उनकी पत्नी ने संतान प्राप्ति के लिए देवी सावित्री की तपस्या की। जिसके बाद देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें संतान होने का आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद के तहत उनकी घर पुत्री का जन्म हुआ, जिसका नाम उन्होंने देवी के नाम पर यानी सावित्री रखा। विवाह योग्य होने पर राजा अश्वपति ने अपनी पुत्री सावित्री को स्वयं अपना वर चुनने का अवसर दिया। इस दौरान उन्होंने निर्वासित राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को अपने पति के रूप में चुना।
लेकिन बाद में उसे पता चला कि सत्यवान की आयु मात्र एक वर्ष शेष थी। इसके बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। ये सब जानने के बावजूद सावित्री ने सत्यवान को ही चुना और विवाह किया। पति के मृत्यु के दिन पास आते ही सावित्री ने कठिन व्रत और तपस्या शुरू कर दी। जिस दिन यमराज सत्यवान का प्राण लेने आए, सावित्री उनके पीछे चल पड़ी। अपनी बुद्धिमत्ता और पति-भक्ति से उसने यमराज को प्रसन्न कर सत्यवान को जीवित करा लिया। सावित्री की इस निष्ठा के कारण महिलाएं इस व्रत को रखकर पति की लंबी आयु की कामना करती हैं।